कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Katha Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३२ कठोपनिषद् [ अध्याय १
इमा रामाः सरथाः सतूर्या न हीदृशा लम्भनीया मनुष्यैः । आभिर्मत्प्रत्ताभिः परिचारयस्व नचिकेतो मरणं मानुप्राक्षीः ॥ २५ ॥
मनुष्यलोकमें जो-जो भोग दुर्लभ हैं उन सब भोगोंको तू स्वच्छन्दता-पूर्वक माँग ले । यहाँ रथ और बाजोंके सहित ये रमणियाँ हैं । ऐसी स्त्रियाँ मनुष्योंको प्राप्त होने योग्य नहीं होतीं । मेरे द्वारा दी हुई इन कामिनियोंसे तू अपनी सेवा करा । परन्तु हे नचिकेता ! तू मरणसम्बन्धी प्रश्न मत पूछ ॥ २५ ॥
| ये ये कामाः प्रार्थनीया दुर्लभाश्च मर्त्यलोके सर्वांस्तान् कामांश्छन्दत इच्छात्तः प्रार्थयस्व । किं चेमा दिव्या अप्सरसो रमयन्ति पुरुषानिति रामाः सह रथैर्वर्तन्त इति सरथाः सतूर्याः सवादित्रास्ताश्च न हि लम्भनीयाः प्रापणीया ईदृशा एवंविधा मनुष्यैर्मर्त्यैरस्मदादिप्रसादमन्तरेण । आभिर्मत्प्रत्ताभिर्मया दत्ताभिः परिचारिणीभिः परिचारयस्व आत्मानं पादप्रक्षालनादिशुश्रूषां कारयात्मन इत्यर्थः । नचिकेतो | इस मर्त्यलोकमें जो-जो कामनाएँ—प्रार्थनीय वस्तुएँ दुर्लभ हैं उन सबको छन्दतः—इच्छानुसार माँग ले । इसके सिवा ये रामा—जो पुरुषोंके साथ रमण करती हैं उन्हें 'रामा' कहते हैं, ऐसी ये दिव्य अप्सराएँ सरथा—रथोंके सहित और सतूर्या—तूर्यों ( बाजों ) के सहित मौजूद हैं । हम-जैसे देवताओंकी कृपाके बिना ये अर्थात् ऐसी स्त्रियाँ मरणधर्मा मनुष्योंको प्राप्त होने योग्य नहीं हैं । मेरे द्वारा दी हुई इन परिचारिकाओंसे तू अपनी परिचर्या अर्थात् पादप्रक्षालनादि सेवा करा; किन्तु हे नचिकेता ! मरण अर्थात् |