भारतकोश
कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Katha Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished182 पृष्ठ

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पृष्ठ 46
३४कठोपनिषद्[ अध्याय १

| अनर्थायैवैते धर्मवीर्यप्रज्ञातेजोयशःप्रभृतीनां क्षपयितृत्वात् । यां चापि दीर्घजीविकां त्वं दित्ससि तत्रापि शृणु । सर्वं यद्ब्रह्मणोऽपि जीवितमायुरल्पमेव किमुतास्मदादिदीर्घजीविका । अतस्तवैव तिष्ठन्तु वाहा रथादयः तथा नृत्यगीते च ॥ २६ ॥ | जीर्ण—क्षीण ही कर देते हैं, अतः धर्म, वीर्य, प्रज्ञा, तेज और यश आदिका क्षय करनेवाले होनेसे ये अनर्थके ही कारण हैं । और आप जो दीर्घजीवन देना चाहते हैं उसके विषयमें भी सुनिये । ब्रह्माका जो सम्पूर्ण जीवन—आयु है वह भी अल्प ही है, फिर हम-जैसोंके दीर्घजीवनकी तो बात ही क्या है ? अतः आपके रथादि वाहन और नाच-गान आपके ही रहें ॥ २६ ॥ |

| किं च— | इसके सिवा— |

न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यो
लप्स्यामहे वित्तमद्राक्ष्म चेत्त्वा ।
जीविष्यामो यावदीशिष्यसि त्वं
वरस्तु मे वरणीयः स एव ॥ २७ ॥

मनुष्यको धनसे तृप्त नहीं किया जा सकता । अब यदि आपको देख लिया है तो धन तो हम पा ही लेंगे । जबतक आप शासन करेंगे हम जीवित रहेंगे; किन्तु हमारा प्रार्थनीय वर तो वही है ॥ २७ ॥

| न प्रभूतेन वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यः । न हि लोके वित्तलाभः कस्यचित्तृप्तिकरो दृष्टः | मनुष्यको अधिक धनसे भी तृप्त नहीं किया जा सकता है । लोकमें धनकी प्राप्ति किसीको भी तृप्त करनेवाली नहीं देखी गयी । |