भारतकोश
कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Katha Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished182 पृष्ठ

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पृष्ठ 66
५४कठोपनिषद्[ अध्याय १

| स्तुत्यं महदणिमाद्यैश्वर्योद्यनेक-गुणसंहतं स्तोमं च तन्महच्च निरतिशयत्वात्स्तोममहत्, उरुगायं विस्तीर्णां गतिम्, प्रतिष्ठां स्थितिमात्मनोऽनुत्तमामपि दृष्ट्वा धृत्या धैर्येण धीरो धीमान्सन् नचिकेतोऽत्यस्राक्षीः परमेव आकाङ्क्षन्नतिसृष्टवानसि सर्वम् एतत् संसारभोगजातम् । अहो बतानुत्तमगुणोऽसि ॥ ११ ॥ | स्तुत्य तथा महत्—अणिमादि ऐश्वर्य आदिक अनेक गुणोंके संघातसे युक्त, इस प्रकार जो स्तोम है और महत् भी है ऐसे सर्वोत्कृष्ट होनेके कारण स्तोममहत् उरुगाय—विस्तीर्ण गतिको तथा प्रतिष्ठा—अपनी सर्वोत्तम स्थितिको देखकर भी उसे धैर्यपूर्वक त्याग दिया । अर्थात् एकमात्र परवस्तुकी ही इच्छा करते हुए इस सम्पूर्ण सांसारिक भोगसमूहका परित्याग कर दिया । अहो ! तुम बड़े ही उत्कृष्ट गुणसम्पन्न हो ! ॥ ११ ॥ |

| यं त्वं ज्ञातुमिच्छस्यात्मानम् | जिस आत्माको तुम जानना चाहते हो— |

आत्मज्ञानका फल

तं दुर्दर्शं गूढमनुप्रविष्टं गुहाहितं गह्वरेष्ठं पुराणम् ।
अध्यात्मयोगाधिगमेन देवं मत्वा धीरो हर्षशोकौ जहाति ॥ १२ ॥

उस कठिनतासे दीख पड़नेवाले, गूढ स्थानमें अनुप्रविष्ट, बुद्धिमें स्थित, गहन स्थानमें रहनेवाले, पुरातन देवको अध्यात्मयोगकी प्राप्तिद्वारा जानकर धीर ( बुद्धिमान् ) पुरुष हर्ष-शोकको त्याग देता है ॥ १२ ॥