कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम लम्बकः ७१ ऐसा कहकर शकटाल उस चाणक्य ब्राह्मण को अपने घर ले गया। श्राद्ध के दिन उस राजा के पास ले गया और राजा ने उसे स्वीकार किया ॥११४॥ अनन्तर श्राद्ध के अवसर पर आकर चाणक्य सबसे ऊपर बैठ गया किन्तु सुबन्धु नामक ब्राह्मण उस स्थान को अपने लिए चाहता था॥११५॥ शकटाल ने राजा नन्द के पास जाकर ऊपर बैठन का झगड़ा सुनाया। नन्द ने कहा— सुबन्धु ही सबसे ऊपर बैठेगा। दूसरा योग्य नहीं है। ॥११६॥ भय से नीचे मुँह किये हुए शकटाल ने श्राद्ध-स्थान में आकर, चाणक्य को वह राजाज्ञा सुना दी और कहा कि इसमें मेरा अपराध नहीं है, यह राजाज्ञा है॥११७॥ राजाज्ञा को अपना अपमान समझते हुए क्रोध से जलकर चाणक्य ने अपनी शिखा को खोलकर यह प्रतिज्ञा की॥११८॥ सात दिनों के भीतर राजा नन्द को अवश्य मार डालूँगा। तभी मैं क्रोध-रहित होकर शिखा को बाँधूँगा॥११९॥ ऐसा कहते हुए चाणक्य पर योगनन्द के कुपित होने के कारण वह वहाँ से भागा और शकटाल ने गुप्त रूप से उसे अपने घर में रख लिया॥१२० ॥ शकटाल मन्त्री के द्वारा सामग्री दिये जाने पर वह ब्राह्मण वहीं एकान्त में जाकर कृत्या की साधना करने लगा॥१२१॥ उस कृत्या के प्रभाव से राजा नन्द दाह-ज्वर से सातवें दिन मर गया॥१२२॥ योगनन्द के मरने पर शकटाल ने उसके पुत्र हिरण्यगुप्त को मारकर (असल) नन्द के पुत्र चन्द्रगुप्त को राजा बना दिया॥१२३॥ चन्द्रगुप्त की मन्त्रिता के लिए बृहस्पति के समान बुद्धिमान् चाणक्य को प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार कराकर शकटाल पुत्रों के शोक से विरक्त होकर भीषण वन में चला गया॥१२४ १२५॥ हे राजसूनो ! उस ब्राह्मण के मुख से नन्द-राज्य की समस्त कथा सुनकर मुझे अत्यन्त खेद हुआ कि यह सारा प्रपञ्च अनित्य है॥१२६॥ इसी खेद के कारण मैं विन्ध्यवासिनी का दर्शन करने के लिए यहाँ आया। इनकी कृपा से तुम्हें देखकर मुझे अपना पूर्वजन्म का स्मरण हुआ॥१२७॥ और जाति-स्मरण होने के कारण दिव्य विज्ञान भी प्राप्त हो गया। अब मैं पापमुक्त होकर शरीर छोड़ने का यत्न करूँगा॥१२८॥ हे राजसूनो ! तुम तबतक यहीं रहो, जबतक तीन ब्राह्मणों को छोड़े हुए गुणाढ्य नामक ब्राह्मण शिष्यों के साथ तुम्हारे पास आता है॥१२९ ॥