कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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Read in contextप्रथम लम्बक ७५ षष्ठ तरंग
वररुचि के चले जाने पर उसका मित्र खिन्नहृदय माल्यवान् नामक गण मर्त्यशरीर में गुणाढ्य नाम से विख्यात होकर वन में घूमता हुआ संस्कृत आदि तीन भाषाओं को प्रतिज्ञापूर्वक छोड़कर और सातवाहन राजा की सेवा करके विन्ध्यवासिनी भगवती के दर्शन के लिए आया॥१-२॥
विन्ध्यकामिनी की आज्ञा से उसने विन्ध्यारण्य में काणभूति को देखा। काणभूति को देखते ही गुणाढ्य को अपनी पूर्व जाति का स्मरण हो गया और वह मानो अकस्मात् जाग उठा॥३॥
संस्कृत प्राकृत एवं देशीय (अपभ्रंश)—इन तीनों भाषाओं को छोड़कर पैशाची भाषा में अपना नाम सुनाकर वह काणभूति से बोला॥४॥
मित्र काणभूते पुष्पदन्त से सुनी हुई उस दिव्य कथा को शीघ्र सुनाओ जिसके सुनने पर मैं और तुम दोनों एक साथ ही शाप से मुक्त हो जायेंगे॥५॥
गुणाढ्य की कथा यह सुनकर काणभूति ने गुणाढ्य से कहा—हे स्वामिन्! उस दिव्य कथा को तो मैं सुनाता हूँ। किन्तु मुझे एक महान् कौतूहल है॥६॥
वह यह कि पहले आप अपने जीवन का वृत्तान्त सुनाओ। इस प्रकार काणभूति के प्रार्थना करने पर गुणाढ्य ने अपनी कथा प्रारम्भ की॥७॥
प्रतिष्ठान-प्रदेश में सुप्रतिष्ठित नामक नगर है। वहाँ पर सोमशर्मा नामक एक श्रेष्ठ ब्राह्मण रहता था॥८॥
उस ब्राह्मण के वत्स और गुल्म नामक दो बालक और तीसरी श्रुतार्था नाम की एक कन्या थी॥९॥
कालक्रम से सोमशर्मा और उसकी भार्या दोनों मर गये। उनके मरने पर वत्स और गुल्म दोनों भाई बहन श्रुतार्था का पालन-पोषण करने लगे॥१०॥
उन्होंने किसी समय बहन को गर्भवती देखा। वहाँ अन्य किसी तीसरे पुरुष के अभाव में उन दोनों को परस्पर शंका हुई॥११॥
भाइयों को शंकित देखकर चित्त की बात को समझनेवाली श्रुतार्था ने भाइयों से कहा— 'तुम्हें किसी प्रकार की शंका न करनी चाहिए। मैं सत्य बात तुम्हें बताती हूँ'॥१२॥
नागराज वासुकि के भाई का पुत्र कुमार कीर्तिसेन है। मुझे स्नान के लिए आते हुए उसने देखा॥१३॥
मुझे देखकर काम-पीड़ित हुए कीर्तिसेन ने अपना वंश और नाम बताकर गान्धर्वविधि से मुझे अपनी पत्नी बना लिया॥१४॥
इसलिए मेरा यह गर्भ ब्राह्मण-जाति में है। इस प्रकार बहन की बात सुनकर वत्स और गुल्म बोले कि इसमें क्या प्रमाण है? ॥१५॥