कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
Page 120 of 876
Read in contextप्रथम लम्बक ८५ माली ने मुझसे कहा—यान्त्रिक ! वृद्धों से ऐसा सुना जाता है कि प्राचीन समय में मौनी और निराहारी एक ब्राह्मण यहाँ आया और उसने देव-मन्दिर के साथ इस बाग को बनाया। इसलिए इसमें ब्राह्मणगण बड़े उत्साह के साथ यहाँ एकत्र होते हैं परस्पर मिलते हैं॥७५॥ अति आग्रह के साथ उनसे पूछ आने पर उस ब्राह्मण ने कहा कि इस भारतभूमि में नर्मदा के तट पर भृगुकच्छ नाम का प्रसिद्ध देश है॥७६॥ मैं उसी भृगुकच्छ देश में उत्पन्न एक ब्राह्मण हूँ। मुझ आलसी और दरिद्र को कोई भिक्षा भी नहीं देता था॥७७॥ इस कारण अत्यन्त दुःख से मैं जीवन के प्रति विरक्त होकर अनेक तीर्थों का भ्रमण करता हुआ विन्ध्यवासिनी देवी के दर्शन करने के लिए गया॥७८॥ देवी का दर्शन करके मैंने सोचा कि यहाँ लोग वरदानी देवी को पशुबलि देकर प्रसन्न करते हैं तो मैं मूर्ख और पशु-स्वरूप अपने को ही मारकर बलि क्यों न दे दूँ—ऐसा सोचकर मैंने अपना गला काटने के लिए शस्त्र उठाया ॥७८॥ उसी क्षण प्रसन्न होकर देवी ने मुझे स्वप्न दिया—'पुत्र तू सिद्ध हो गया है। मरने का मत धार! मेरे पास रह' ॥८१॥ इस प्रकार देवी का वर प्राप्त करके मैंने दिव्यता प्राप्त की। उसी से प्यास के साथ मेरी भूख भी नष्ट हो गई॥८२॥ किसी समय वहीं निवास करती हुई देवी ने मुझसे स्वयं कहा—'हे पुत्र, तुम प्रतिष्ठान नगर में जाकर एक अच्छा उद्यान बनाओ ॥८३॥ ऐसा कहकर देवी ने यह दिव्य बीज दिया और उसीके प्रभाव से मैंने यह रमणीय उद्यान बनाया॥८४॥ [L23: बार-बार तुम उद्यान की रक्षा करो तथा कहकर वह अन्तर्धान हो गया। हे राजमित्र ! इस प्रकार प्राचीन समय से देवी ने यह उद्यान को बनाया' ॥८५॥ तदनन्तर (माली) से इस प्रकार उस देश में देवी की कृपा का समाचार सुनकर मैं आश्चर्यचकित होकर घर के लिए लौटा॥८६॥ द्यूताध्यक्ष के द्वारा बन्धन हुए कान्तसेन ने कहा कि राजा यशःकेतु का नाम बली [३] ॥ ७॥