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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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द्वितीय लम्बक १२१ एक बार शिकार खेलने के सिलसिले में उस राजा का वन में शाण्डिल्य मुनि के साथ परिचय हुआ ॥९॥ शाण्डिल्य मुनि ने कौशाम्बी में आकर पुत्र की इच्छावाले राजा की रानी को मन्त्र से पवित्र चरु¹ खिलाया ॥१०॥ शाण्डिल्य मुनि की कृपा से शतानीक को सहस्रानीक नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। उससे पिता ऐसा शोभित हुआ जैसे विनय से गुण शोभित होता है ॥११॥ क्रमशः शतानीक सहस्रानीक को युवराज बनाकर, केवल राज्यसुख भोगने के लिए राजा रह गया। राज्यकार्य की चिन्ता से मुक्त हो गया था ॥१२॥ कुछ समय के अनन्तर असुरों के साथ युद्ध प्रारम्भ होने पर इन्द्र ने सहायता की इच्छा से उसके लिए अपने सारथी मातलि को दूत बनाकर भेजा ॥१३॥ तब शतानीक राज्य-शासन का समस्त भार युगन्धर नाम के मुख्यमन्त्री सुप्रतीक नामक प्रधान सेनापति तथा युवराज सहस्रानीक पर देकर मातलि के साथ इन्द्र के समीप गया ॥१४-१५॥ इन्द्र के देखते-देखते यमदंष्ट्र आदि बहुत-से असुरों को उस युद्ध में मारकर वह राजा शतानीक स्वयं भी मर गया ॥१६॥ मातलि द्वारा उसका शव राजधानी में ले आने पर महारानी उसके साथ सती हो गई और राजलक्ष्मी ने उसके पुत्र सहस्रानीक का आश्रय किया। (अर्थात् सहस्रानीक राजा बन गया) ॥१७॥ आश्चर्य है कि सहस्रानीक के पिता के सिंहासन पर बैठते ही भार से राजाओं के सिर झुक गये अर्थात् सिंहासन को भग्न होना चाहिए, किन्तु राजाओं के सिर नम्र हो गये यह आश्चर्य है ॥१८॥ असुर-विजय के उपलक्ष्य में किये गये उत्सव के समय इन्द्र ने अपने मित्र के पुत्र सहस्रानीक को मातलि द्वारा (रथ भेजकर) स्वर्ग में बुलवाया ॥१९॥ स्वर्ग में रहते हुए सहस्रानीक प्रियतमाओं के साथ नन्दन-वन में विहार करते हुए देवताओं को देखकर, अपने लिए अनुरूप पत्नी की चाह में कुछ शोकयुक्त-सा हो गया ॥२०॥ इन्द्र ने राजा शतानीक के मनोभाव को समझकर कहा—'राजन्! शोक न करो तुम्हारी इच्छा पूर्ण होगी ॥२१॥ राजन् ! तुम्हारे पूर्वजन्म की भार्या जो तुम्हारे अनुरूप है, पृथ्वी पर जन्म ले चुकी है। इस वृत्तान्त को कहता हूँ सुनो' ॥२२॥ रानी मृगावती के विवाह की कथा प्राचीन समय में पितामह (ब्रह्मा) का दर्शन करने के लिए मैं उनकी सभा में गया था। मेरे ही पीछे विधूम नाम का एक वसु भी सभा में आ गया ॥२३॥ १ चावल, चीनी और दूध मिला हुआ हवन-द्रव्य। १६

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