कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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Read in contextद्वितीय लम्बक १२७ तिलोत्तमा के शाप का समाचार जानता हुआ और मन्त्रियों द्वारा समझाया-बुझाया गया राजा किसी प्रकार आश्वस्त हुआ ॥५४॥ उधर वह पक्षिराज भी रानी को उड़ाकर ले गया किन्तु जीवित देखकर उसने उदय पर्वत पर उसे (रानी को) छोड़ दिया ॥५५॥ छोड़कर पक्षी के चले जाने पर, शोक और भय से व्याकुल रानी ने दुर्यम पर्वत पर अपने को अनाथ पाया ॥५६॥ अनन्तर एक वस्त्र पहने हुई जंगल म रोती हुई उस एकाकिनी रानी को खाने के लिए एक भारी अजगर तैयार हुआ ॥५७॥ सहसा दिखकर अन्तर्हित हुए किसी दिव्य पुरुष ने अजगर को मारकर उस शुभ भविष्य- वाली रानी की रक्षा की ॥५८॥ रानी ने दुख के कारण स्वयं मरने की इच्छा से जंगली हाथी के सामने अपना शरीर फेंक दिया (अपने को डाल दिया) किन्तु मानों दया से उसने भी रानी की रक्षा की ॥५९॥ आँखों के सामने पड़ी हुई रानी को इस जन्तु (हाथी) ने नहीं मारा यह आश्चर्य है ! ईश्वर की इच्छा से क्या नहीं हो सकता ॥६०॥ इसके अनन्तर गर्भभार से अलसायी हुई और पतन (गिरकर प्राण देने) के लिए तैयार वह कोमल बालिका फूट-फूटकर रोने लगी ॥६१॥ उसके करुण क्रन्दन को सुनकर फल-मूल संग्रह करते हुए एक मुनिपुत्र ने मूर्तिमती शोक- रेखा के समान उस रानी को देखा ॥६२॥ दयालु मुनिकुमार रानी से सब वृत्तान्त सुनकर और उस किमी प्रकार धीरज बँधाकर, जमदग्नि ऋषि के आश्रम में ले गया ॥६३॥ वहाँ पर उसने मूर्तिमान् आश्वासन के समान तेज से उदयाचल पर मानों बालार्क को स्थिर करत हुए जमदग्नि को देखा ॥६४॥ शरणागतों पर दया करनेवाले दिव्यदृष्टि ऋषि ने पैरों पर पड़ी हुई एवं वियोग-दुःख से पीड़ित रानी को कहा—'बेटी ! अपने पिता के वंश को चलानेवाला तेरा पुत्र इसी आश्रम में उत्पन्न होगा और पति के साथ तेरा समागम भी होगा। अब शोक मत करो' ॥६५-६६॥ जमदग्नि मुनि द्वारा इस प्रकार आश्वस्त पतिव्रता मृगावती ने प्रिय पति के समागम की आशा के साथ-साथ उस आश्रम में निवास स्वीकार किया ॥६७॥ उदयन के जन्म की कथा कुछ दिनों के बीतने पर सदाचारिणी मृगावती ने सार्वभौम मदाचार के समान अनेक गुणों से युक्त पुत्ररत्न उत्पन्न किया ॥६८॥ १ उस पर्वत पर मुनि अपने तेजस्वी भामण्डल से उदीयमान सूर्य की भाँति चमकते रहते थे। — अनु