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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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द्वितीय लम्बक १४७ इधर कुमारी के भवन में आग लगने से धीदत्त की भेजी हुई वह पायक-स्त्री कन्या के साथ जल गई॥११२॥ वहाँ के लोगों ने भावनिका के साथ राजकुमारी को जला हुआ समझ लिया और प्रातःकाल धीदत्त को वहाँ उपस्थित देखा॥११३॥ दूसरी रात को धीदत्त 'मृगांक' नामक खड्ग को हाथ में लेकर पहले से भागी हुई प्रिया (राजकुमारी) से मिलने के लिए चल पड़ा॥११४॥ उत्सुक धीदत्त रात में ही लम्बा रास्ता तै करके प्रातःकाल एक प्रहर व्यतीत होने पर विन्ध्याचल के घोर जंगल में जा पहुँचा ॥११५॥ धीदत्त ने प्रस्थान करते हुए पहले अशुभसूचक शकुन देखे और पीछे भावनिका के साथ आक्रमण से व्याकुल अपने मित्रों को देखा ॥११६॥ वे लोग घबराकर भागे हुए धीदत्त से बोले—'हम लोग बहुत बड़ी घुड़सवार-सेना द्वारा घेर लिये गये हैं॥११७॥ हम लोगों के घायल होने पर एक घुड़सवार सैनिक राजकुमारी को घोड़े पर बैठा कर ले भागा॥११८॥ अतः जबतक वे लोग दूर नहीं चले जाते तबतक इसी मार्ग से उस ओर जाओ। हम लोगों के पास न रहो। उस (राजकुमारी) की रक्षा प्रधान कर्त्तव्य है' ॥११९॥ इस प्रकार उन मित्रों का भेजा हुआ धीदत्त लौटकर वेग से घोड़ा दौड़ाता हुआ गया। कुछ ही दूर आगे उसने घुड़सवार-सेना को देखा और उसके बीच एक युवा क्षत्रिय को भी उसने देखा॥१२०-१२१॥ उस युवा द्वारा घोड़े पर चढ़ाकर पकड़ी हुई राजकुमारी को भी उसने देखा और क्रमशः उन दोनों के समीप आ गया॥१२२॥ शान्तिपूर्वक राजकुमारी को न छोड़ते हुए उस युवक को धीदत्त ने पैरों से खींचकर पत्थर पर दे मारा और घोड़े से गिराकर चूर-चूर कर दिया ॥१२३॥ उसने उसे मारकर और उसी के घोड़े पर सवार होकर अन्यान्य क्रुद्ध एवं भागते हुए उसके सिपाहियों को भी मारा। बचे हुए सिपाही धीदत्त के अमानुष पराक्रम को देखकर डर से इधर-उधर भाग गये॥१२४-१२५॥ अकस्मात् धीदत्त भी राजकुमारी मृगांकवती को साथ लेकर अपने मित्रों की ओर लौटा ॥१२६॥ कुछ दूर जाने पर लड़ाई में घायल हुआ उसका घोड़ा गिर गया। धीदत्त जब अपनी पत्नी को लेकर उससे उतरा तब वह घोड़ा मर गया ॥१२७॥