कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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Read in contextद्वितीय लम्बक १७५ अकेले वीणा बजाता हुआ और मधुर स्वर में गाता हुआ साथ ही अपने बन्धन की बात को भी सोचता हुआ वह राजा धीरे-धीरे हाथी के समीप चला गया॥१७॥ गीत की ओर तन्मय होने और सन्ध्याकालीन अन्धकार के घने होने के कारण राजा उस काष्ठ के रूप में निर्मित माया-गज को वास्तविक रूप में न पहचान सका॥१८॥ वह हाथी भी मानों गीतरस में मग्न होकर लम्बे-लम्बे कानों को हिलाता हुआ राजा के समीप आता हुआ-सा धीरे-धीरे उस दूर एकान्त में ले गया। एकान्त में पहुँचते ही उस यान्त्रिक हाथी के उदर से निकलकर पहले से तैयार कुछ वीर सिपाहियों ने राजा को घेर लिया॥१९-२०॥ उन्हें देखकर क्रुद्ध राजा ने कमर से छुरी खींचकर बगल सिपाहियों से जूझना प्रारम्भ किया। इतने में ही संकेत पाकर पीछे छिपे हुए अन्य सैनिक भी जंगल से निकल आये और पीछे से आक्रमण करके बलपूर्वक राजा उदयन को बन्दी बनाकर चण्डमहासेन के पास ले गये॥२१-२२॥ चण्डमहासेन भी वत्सराज को देखकर प्रसन्न हुआ। उसने आगे बढ़कर उसका