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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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[Page Header] द्वितीय लम्बक १८५

तब विदूषक वसन्तक बोला- 'मैं अच्छी-अच्छी कहानियाँ कहना जानता हूँ। तब वासवदत्ता ने कहा- 'अच्छा एक अच्छी-सी कहानी सुनाओ तो' ॥७६॥ तब वह वसन्तक राजपुत्री वासवदत्ता का मनोरंजन करता हुआ हास्य के पुट से सरस एवं एक विचित्र कहानी सुनाते हुए कहने लगा ॥७७॥

लोहजंघ की कथा

इस देश में भगवान् कृष्ण की जन्मभूमि मथुरा नाम की एक नगरी है। उसमें रूपनिका नाम की एक वेश्या रहती थी ॥७८॥ उसकी माता मकरदंष्ट्रा नाम की बूढ़ी कुट्टनी थी। वह मानो रूपनिका के रूप और गुणों पर आकृष्ट कामुकों की आँखों के लिए विष के समान थी ॥७९॥ एक बार किसी देवता के पूजन के लिए रूपनिका किसी मन्दिर में गई और उसने दूर से ही किसी एक युवा पुरुष को देखा ॥८०॥ रूपनिका को देखते ही वह युवक उसके हृदय में गड़-सा गया और कुट्टनी माता के सभी उपदेश उसके हृदय से दूर हो गये। उनका स्थान मानो उस पुरुष ने ले लिया। रूपनिका ने अपनी सेविका से कहा- 'तुम उस पुरुष के पास जाकर कहो कि आज वह मेरे घर पर आवे' ॥८१-८२॥ सेविका ने इस प्रकार स्वामिनी का सन्देश उस पुरुष से कह दिया। वेश्या का सन्देश सुनने पर और कुछ सोचकर वह युवक बोला- ॥८३॥ 'मैं लोहजंघ नामक ब्राह्मण हूँ। मेरे पास धन नहीं है। इसलिए धनिकों के जाने योग्य रूपनिका के घर में मेरी क्या योग्यता है' ॥८४॥ सेविका ने कहा- मेरी मालकिन तुमसे धन नहीं चाहती। सेविका का यह उत्तर सुनकर लोहजंघ ने उसके घर जाना स्वीकार कर लिया ॥८५॥ सेविका से यह समाचार सुनकर, उत्सुकतापूर्वक घर आकर उसके आने की राह देखती हुई रूपनिका खिड़की में बैठ गई ॥८६॥ कुछ समय के अनन्तर पूर्वनिश्चयानुसार लोहजंघ उसके घर आ गया और वेश्या की माता मकरदंष्ट्रा कुट्टनी को आश्चर्य हुआ कि यह कहाँ से आया ॥८७॥ रूपनिका भी उसका आगमन देखकर प्रसन्न हुई और उठकर उसका स्वागत करती हुई शयनगृह में ले जाकर आनन्दमग्न हो गई। लोहजंघ के सहवास से उसे ऐसा आनन्द प्राप्त हुआ जिसे पाकर उसने अपना जन्म सफल समझा ॥८८-८९॥