कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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Read in contextद्वितीय लम्बक १९३ सायंकाल होने पर हाथों में शंख-चक्र धारण करके उसी गरुड़ पक्षी पर बैठकर रूपणिका वेश्या के घर की छत पर आकाश से उतरा ॥१५२॥ उसने वेश्या को गुप्त रूप से सुनाते हुए ऊपर से कुछ शब्द किया ॥१५३॥ उसकी वाणी सुनकर बाहर आई रूपणिका ने रत्नों से अलंकृत एवं भगवान् के स्वरूप में लोहजंघ को उस रात्रि में देखा ॥१५४॥ 'मैं भगवान् हरि स्वयं तुम्हारे लिए आया हूँ' लोहजंघ के ऐसा कहने पर वेश्या उसे प्रणाम करके बोली—'महाराज आपकी कृपा है। आप दया करें और यहाँ ठहरें'। लोहजंघ ने पक्षी से उतरकर उसे बाँध दिया और वेश्या के साथ उसके शयनकक्ष में प्रवेश किया ॥१५५ १५६॥ कुछ समय के अनन्तर वेश्या-भवन से निकलकर लोहजंघ पक्षी पर बैठकर पुनः अपने निवास पर आ गया ॥१५७॥ प्रातःकाल होते ही रूपणिका वेश्या ने सोचा कि मैं भगवान् विष्णु की प्रेयसी होने के कारण देवता हो गई। अब तो मनुष्यों के साथ बात करना भी अपमान है। ऐसा सोचकर उसने मौन धारण कर लिया और पर्दे में रहने लगी ॥१५८॥ उसकी माता मकरदंष्ट्रा ने उसकी यह स्थिति देखकर पूछा कि 'आज तुम इस प्रकार मौन क्यों हो रही हो ? मुझे बताओ'। उसके आग्रहपूर्वक और बारम्बार पूछने पर रूपणिका ने पर्दे की ओट से मौन का सारा भेद बता दिया ॥१५९-१६०॥ कुट्टनी को बेटी की बातों पर सन्देह हुआ और उसी रात को उसने स्वयं अपनी आँखों से गरुड़ पर बैठे हुए विष्णुरूपी लोहजंघ को देखा ॥१६१॥ प्रातःकाल ही कुट्टनी ने पर्दे में बैठी हुई रूपणिका को बड़े ही सभ्रमभाव से कहा ॥१६२॥ 'हे बेटी ! भगवान् की कृपा से तू तो देवता बन गई। मैं तेरी माता हूँ। मुझे भी तो लड़की होने का फल दे' ॥१६३॥ 'मैं बूढ़ी इस शरीर से जिस प्रकार स्वर्ग चली जाऊँ, ऐसी कृपा के लिए तुम भगवान् से निवेदन करो'। रात को उसी छद्मरूप में आये हुए लोहजंघ को वेश्या की माता ने प्रार्थना सुना दी ॥१६४-१६५॥ २५