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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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'भला यह भी कोई धर्म है—कुट्टिनी ने मेरे साथ यह मूर्खता की चाल चली है। ऐसा सोचकर बुद्धिमती देवस्मिता परिव्राजिका से बोली—'भगवति ! इतने दिनों तक मैं इस धर्म को नहीं जानती थी किन्तु आज जान गई। इसलिए तुम किसी सुन्दर पुरुष के साथ मेरा संगम कराओ' ।।१३६-१३७।। तब परिव्राजिका कहने लगी कि कटाह द्वीप से कुछ वैश्य-पुत्र आये हैं। वहीं ठहरे हैं। अतः मैं उन्हें तुम्हारे लिए लाती हूँ ।।१३८।। ऐसा कहकर प्रसन्न होती हुई कुट्टिनी अपने घर गई और इधर बुद्धिमती देवस्मिता ने अपनी सेविकाओं से निःशंक होकर कहा—'मेरे पति के हाथ में सदा खिले हुए कमल-गुच्छ को देखकर और उस मद्यप से सारा वृत्तान्त पूछकर दूसरे द्वीप से कुछ दुष्ट वैश्यपुत्र मेरा सतीत्व विनाश करने के लिए यहाँ आये हैं। उन्होंने ही इस कुट्टिनी दुष्टा तपस्विनी को मित्र किया है। इसलिए तुमलोग धतूरा मिला हुआ मद्य शीघ्रता से लाओ और बाजार में जाकर कुत्ते के लोहे के पैर बनवा लाओ।।१३९-१४२।। देवस्मिता के आज्ञानुसार सेविकाओं ने ऐसा ही किया और एक सेविका ने उसके आज्ञा- नुसार देवस्मिता का रूप धारण किया।।१४३।। उधर परिव्राजिका भी 'पहले मैं पहले मैं' करते हुए उन चारों में से एक को अपनी शिष्या के वेश में छिपाकर गुप्त रूप से देवस्मिता के घर पर आई।।१४४।। इस प्रकार सायंकाल ही उसे देवस्मिता के घर में प्रविष्ट कराकर वह धीरे-से गुप्त रूप से लौट गई। वैश्यपुत्र के घर आने पर देवस्मिता के रूप में बैठी हुई दासी ने उस धतूरा मिला हुआ प्रचुर मद्य-पान कराया। मद्य के नशे से उन्मत्त वैश्यपुत्र के शरीर के सारे वस्त्र और आभूषण उतरवाकर दासियों ने उसे नंगा कर दिया। फिर उन्हीं दासियों ने कुत्ते के लोहे के पैरों को आग में लाल करके उससे उसका अगल द्रव्य (दाग) करके उस रात्रि के अन्धकार में किसी मल के कूप (गड्डाम) में फेंक दिया। उसी कूप में पड़े हुए उस वैश्य-पुत्र ने प्रातः मूर्च्छा के अन्त उतरने पर अपने को देखा कि वह अपने पापों के प्रतिबन्धन-स्वरूप अन्धकूप में पड़ा है ।।१४५-१४९।। किसी प्रकार उस गढ़े से निकलकर और स्नान करके वस्त्रों के न रहने पर नग्न घोटता हुआ वह भाग ही परिव्राजिका के घर पहुँचा। अकेला मैं ही हास्य का पात्र (वेषमन्द) न बनूँ—यह जानकर उसने कहा कि रात को उसके घर में आते हुए मुझे चोरों ने मार दिया और मेरी यह दशा कर दी।।१५०-१५१।। २८