BharatKosha
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

Page 262 of 876

Read in context
Page 262

द्वितीय लम्बक २२१ सेठ समुद्रदत्त और शक्तिमती की कथा 'बेटी शक्तिमती ने कैसे अपने पति की रक्षा की थी ?—सास के इस प्रकार प्रश्न करने पर देवस्मिता ने कहा—'हमारे देश में नगर के भीतर मणिभद्र नाम के एक महायक्ष की मूर्ति एक मन्दिर में प्रतिष्ठित है। नगर-निवासी अपनी-अपनी कार्यसिद्धि के लिए उस मणिभद्र-मन्दिर में जाकर मन्नतें मानते हैं, और अपने-अपने कार्य के अनुसार वहाँ उपहार चढ़ाते हैं। जो व्यक्ति उस मन्दिर में दूसरी स्त्री के साथ पाया जाता था उसे रात में मन्दिर के भीतरी भाग में बन्द कर दिया जाता था। वह प्रातःकाल उसी स्त्री के साथ राजसभा में ले जाया जाता था। वहाँ उसका वृत्तान्त प्रकट करके उसे मार डालने का दण्ड दिया जाता था। ऐसी व्यवस्था वहाँ थी ॥१६४-१६८॥ एक बार उस मन्दिर में रात के समय दूसरी स्त्री के साथ समुद्रदत्त नामक बनिये को नगर-रक्षक (कोतवाल) ने पकड़ा और उसे मन्दिर के भीतर उस स्त्री के साथ बन्द करके सुदृढ़ साँकल लगवा दिये ॥१६९-१७०॥ उसी समय समुद्रदत्त की अत्यन्त बुद्धिमती और पतिव्रता पत्नी ने यह समाचार सुना। और साथियों के साथ पूजा-सामग्री आदि उपहार लेकर वह मन्दिर में गई ॥१७१-१७२॥ मन्दिर के पुजारी ने लम्बी दक्षिणा के लोभ से कोतवाल को कहकर मन्दिर का द्वार खुलवा दिया ॥१७३॥ उसने मन्दिर के भीतर जाकर किसी स्त्री के साथ अपने पति को देखा और अपने कपड़े उस स्त्री को पहिनाकर कहा—'तुम जाओ' ॥१७४॥ वह स्त्री शक्तिमती के वेष में बाहर निकल गई और शक्तिमती उस स्त्री के वेष में पति के पास रह गई ॥१७५॥ प्रातःकाल राजा के अधिकारियों ने जब जाकर देखा तो वह बनिया अपनी स्त्री के साथ पाया गया ॥१७६॥ यह वृत्तान्त जानकर राजा ने मृत्यु-मुख से उसे मुक्त कर दिया और प्रमाद करने के कारण कोतवाल को दंड दिया ॥१७७॥ समुद्रदत्त की कथा समाप्त। जिस प्रकार पूर्वकाल में शक्तिमती ने बुद्धि से अपने पति की रक्षा की थी उसी प्रकार मैं भी उपाय करके अपने पति की रक्षा करूँगी ॥१७८॥