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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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तृतीय लम्बक २४७ इसी प्रकार इस क्रूर प्रयोग की असफलता होने पर कहीं हम भी हँसी के पात्र न बनें। राजा के लिए वासवदत्ता का वियोग अत्यन्त असह्य है, इस कारण और कुछ अनर्थ भी सम्भव है। राजा के रहते हुए जो भी है उससे भी हाथ धोना पड़ेगा। रुमण्वान् के इस प्रकार कहने पर यौगन्धरायण ने कहा—'बिना उद्योग के सिद्धि नहीं प्राप्त होगी। यदि उद्योग न किया जायगा तो उस व्यसनी राजा का जो शेष राज्य है, वह भी न रह जायगा' ॥५४-५७॥ जिन राजाओं की सफलता मन्त्रियों के अधीन होती है, उनके लिए मन्त्रियों की बुद्धि ही कार्य-साधन करती है, इसलिए राजा का उपकार न करने के कारण हम दोषी होंगे। स्वायत्त-सिद्धि राजाओं के कर्त्तव्य या अकर्त्तव्य के लिए उनकी निजी बुद्धि ही साधन होती है। उनके लिए कुछ करने या न करने में मन्त्रियों का उत्तरदायित्व नहीं होता। सचिवायत्त सिद्धिवाले राजा यदि निरुत्साह और निष्द्योग रहेंगे तो राजलक्ष्मी को तिलांजलि देनी होगी। यदि तुम महारानी के पिता चंडमहासेन से शंका करते हो तो व्यर्थ है। वह राजा और उसका पुत्र गोपालक मेरी बात मानते ही हैं, ॥५८-६१॥ धीर-धुरन्धर यौगन्धरायण के ऐसा कहने पर प्रमाद से शंकित चित्तवाला रुमण्वान् फिर बोला—बड़े-बड़े विवेकी पुरुष भी अति प्रिय स्त्री के वियोग से पीड़ित होते हैं, फिर वत्सराज की तो बात ही क्या? इस प्रसंग में यह कथा सुनो—॥६१ ६२॥ राजा देवसेन और उन्मादिनी की कथा पूर्व समय में देवसेन नाम का बुद्धिमानों में श्रेष्ठ राजा था। श्रावस्ती नाम की नगरी उसकी राजधानी थी। उस नगरी में एक अत्यन्त धनी बनिया था। उसकी एक अत्यन्त सुन्दरी कन्या थी। वह कन्या उन्मादिनी के नाम से प्रसिद्ध हुई क्योंकि उसे देखकर, देखनेवाले उन्मत्त हो जाते थे ॥६४-६५॥ वैश्य ने सोचा कि राजा को सूचना दिये बिना इस कन्या को कहीं न दूँगा नहीं तो राजा कुपित होगा ॥६६॥ तब उसने राजा देवसेन के पास जाकर निवेदन किया कि राजन् मेरे यहाँ एक कन्यारत्न है। यदि आपके उपयोगी हो तो आप उसे ग्रहण करें ॥६७॥