कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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Read in contextतृतीय लम्बक २५३ राजा पुण्यसेन की कथा प्राचीन काल में उज्जयिनी में पुण्यसेन नाम का राजा था। वह किसी बलवान् शत्रु राजा से आक्रान्त हो गया। उसके धैर्यशाली मन्त्रियों ने शत्रु को अजेय समझकर यह झूठी घोषणा कर दी कि राजा मर गया और अन्य किसी मुर्दे का राजा के समान धूमधाम से संस्कार करा दिया ॥१९॥ तदनन्तर मन्त्रियों ने एक दूत द्वारा शत्रु राजा को यह सन्देश भेजा कि हमलोग बिना राजा के अनाथ हो गये हैं। अब आप ही हमारे राजा बनिए ॥२०॥ सन्देश सुनकर राजा सन्तुष्ट एवं युद्ध के लिए शिथिल हो गया और उसने स्वीकार कर लिया। इस सन्धि के अवसर से लाभ उठाकर मन्त्रियों ने उसकी शिथिल सेना पर छापा मार दिया ॥२१॥ सेना के पैर उखड़ गये और वह भाग गई। तब मन्त्रियों ने अपने राजा पुण्यसेन को प्रकट करके शत्रु-राजा को भी पकड़कर मार दिया। राज्य-संबंधी काम इसी प्रकार छल-कपटों से सिद्ध किये जाते हैं। इसी प्रकार महारानी के जल जाने का हल्ला मचाकर हमलोग धैर्यपूर्वक कार्य करते हैं ॥२२॥ इस कार्य के लिए दृढ़ निश्चय किये हुए यौगन्धरायण से यह सुनकर रुमण्वान् ने कहा कि यदि ऐसी बात है तो मैं तैयार हूँ। महारानी के भाई गोपालक को बाहर बुलाकर उसके साथ भलीभाँति विचार कर लो' ॥२३॥ तब यौगन्धरायण ने 'ऐसा ही हो'—यह कहकर दूसरे ही दिन गोपालक को मिलने के बहाने बुलाने के लिए दूत भेजा ॥२४॥ प्रथम बार विवाह के लिए आया गोपालक इस बार दूत के कहने से मूर्त्तिमान् उत्सव के समान कौशाम्बी आया। उसके आने के दिन ही यौगन्धरायण उसे रात में रुमण्वान् के साथ अपने घर ले गया ॥२५-२६॥ वहाँ ले जाकर यौगन्धरायण ने रुमण्वान् के साथ परामर्श करके जो मन्तव्य निर्धारित किया था वह गोपालक को कह सुनाया ॥२७॥