भारतकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

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तृतीय लम्बक २७१ वहाँ आकर राजा ने अपने पूर्णचन्द्र के समान मुख से पूर्णिमा के चन्द्र को लजानेवाली पद्मावती को देखा। उसके शरीर पर, अपनी दिव्य माला और तिलक देखकर उसे यह चिन्ता हुई कि ये वस्तुएँ इसे कैसे प्राप्त हुई ॥७७-७८॥ तदनन्तर विवाह-वेदी पर बैठकर उसने जो पद्मावती का हाथ पकड़ा वही मानों समस्त पृथ्वी के कर-ग्रहण का प्रारम्भ था ॥७९॥ यह वासवदत्ता के अतिरिक्त दूसरी पत्नी को देखना भी नहीं चाहता मानों इसीलिए धुएं ने उसकी आँखें बन्द कर दीं ॥८०॥ अग्नि की प्रदक्षिणा के समय धूएं से लाल पद्मावती का मुख मानों इसीलिए क्रोध से तमतमाने लगा था ॥८१॥ विवाह-विधि सम्पन्न हो जाने पर, वत्सराज ने वधू के हाथ को त्याग दिया। किन्तु हृदय से वासवदत्ता को नहीं छोड़ा। विवाह के दहेज में मगध-नरेश ने राजा को इतने रत्न भेंट किय कि मालूम होता था कि समूची पृथ्वी के रत्न दुह लिये गये ॥८२-८३॥ उसी अवसर पर यौगन्धरायण ने अग्नि को साक्षी करके मगधेश्वर से यह विश्वास प्राप्त किया कि वह जामाता वत्सराज से कभी भी विरोध न करेगा ॥८४॥ विवाहोत्सव में कपडे और गहने बाँटे गये चारणों ने सुन्दर गीत गाये और वेश्याओं ने नृत्य किये ॥८५॥ पति का अभ्युदय चाहनेवाली वासवदत्ता खोई हुई की तरह एकान्त में स्थित होकर उस समय वैसी प्रतीत होती थी जैसी दिन में चन्द्रमा की कान्ति ॥८६॥ तब अन्तःपुर में वत्सराज उदयन के आ जाने पर बुद्धिमान यौगन्धरायण को आशंका हुई कि कहीं राजा वासवदत्ता को न देख ले ॥८७॥ वासवदत्ता के छिपाने का मन्त्र भंग न हो जाय इस भय से यौगन्धरायण ने मगधेश से कहा कि राजा आज ही तुम्हारे यहाँ से विदा हो जायगा ॥८८॥ मगध-नरेश ने इसे स्वीकार कर लिया उसी प्रकार वत्सराज ने भी इसे स्वीकार किया ॥८९॥ बारातियों के खाने-पीने के अनन्तर वत्सराज उदयन क्षत्रियों के साथ पद्मावती को लेकर लौट आया ॥९०॥