कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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Read in contextश्री आचार्य जिनचन्द्र ज्ञान भण्डार लाल भवन घीड़ा रास्ता, जयपुर सिटी ( राजस्थान ) कथापोट नाम प्रथमो लम्बकः पद गुरुगिरीन्द्रजाप्रणयमन्दरालोलुभा— स्फुरा किर' कथामृत हरमुखाम्बुधेरुद्गतम् । प्रसङ्ग सरयन्ति ये विगतविघ्नलब्धश्रिया धुर दधति वधुधीं भुवि भवप्रसादन त ॥ कथापीठ नामक प्रथम लम्बक मगेन्द्र-नन्दिनी पार्वती के प्रबल प्रणय मन्दराचल के मन्थन द्वारा शिवजी के मुखरूपी समुद्र से निकले हुए इस कथारूपी अमृत का जो लोग आदर और आग्रहपूर्वक पान करते हैं वे शिवजी की कृपा से निर्विघ्न सिद्धियों को प्राप्त कर, दिव्यपद लाभ करते हैं। १ लम्बक शब्द का पैशाची भाषा में मूल रूप लम्भक है। यह विश्रामस्थान के लिए प्रयुक्त किया गया है। प्रथम लम्बक में बृहत्कथा के प्रसार के लिए, राजा सातवाहन ने कथापीठ की स्थापना की थी और गुणाढ्य के शिष्यों—गुणदेव और नन्दिदेव—द्वारा इसका व्याख्यान किया गया। इसलिए यह लम्बक कथापीठ है। कुछ लोगों का मत है कि यह लम्बक मूल लेखक गुणाढ्य द्वारा नहीं लिखा गया। इसकी रचना उनके शिष्यों या राजा सातवाहन ने की। विस्तृत विवरण भूमिका में देखिए।—अनु