कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
पृष्ठ 322, कुल 876 में से
संदर्भ में पढ़ेंराजा ने कहा—'उर्वशी के सम्पर्क से जो कुछ मैं जानता हूँ उसे तुम्हारे गुरु तुम्बुरु भी नहीं जानते'। यह सुनकर तुम्बुरु ने क्रोध में भरकर राजा को शाप दिया कि जबतक कृष्ण की आराधना न करोगे तबतक उर्वशी से तुम्हारा वियोग हो जायगा ॥२२-२३॥
शाप को सुनकर राजा पुरूरवा ने अकास में वज्रपात के समान यह शाप उर्वशी को कह सुनाया ॥२४॥
तदनन्तर अकस्मात् गन्धर्वों ने तुम्बुरु की आज्ञा से आकर गुप्त रूप से उर्वशी का अपहरण कर लिया ॥२५॥
पुरूरवा ने इसे शाप का फल समझ कर बदरिकाश्रम में जाकर भगवदाराधन प्रारम्भ किया ॥२६॥
गन्धर्व-लोक में राजा के वियोग से सन्तप्त उर्वशी निर्जीव-सी सोई-सी चित्रलिखित-सी एवं संज्ञाहीन होकर पड़ रही। वह शाप के अन्त की आशा पर अवलम्बित विरह से लम्बी रात्रियों में चकवी के समान तड़पती-सी रहती किन्तु प्राणों से विरक्त न हुई ॥२७-२८॥
इधर पुरूरवा ने भगवान् विष्णु को तप से प्रसन्न किया। भगवान् की कृपा से गन्धर्वों ने उसकी उर्वशी को छोड़ दिया ॥२९॥
शाप के अन्त में पुनः प्राप्त हुई उर्वशी के साथ राजा भूलोक में स्वर्गीय आनन्द का उपभोग करता था ॥३०॥
इस प्रकार कथा सुनाकर राजा के चुप होने पर उर्वशी की विरह-वेदना की सहन-शक्ति को जानकर वासवदत्ता मन-ही-मन लज्जित हुई ॥३१॥
राजा के द्वारा युक्तिपूर्वक उपालम्भ दी गई वासवदत्ता को कुछ लज्जित देखकर उसे आश्वासन देने के लिए यौगन्धरायण ने कहा ॥३२॥
विहितसेन और तेजस्वती की कथा
हे राजन् ! यदि तुमने यह कथा न सुनी हो तो सुनो। भू-लोक में लक्ष्मी के निवास भवन के समान तिमिश्र नाम की समृद्ध नगरी है ॥३३॥
उसमें विहितसेन नाम का राजा राज्य करता था। उसकी रानी तेजस्वती भूतल की अप्सरा थी। उसके कण्ठाश्लेष में संलग्न-हृदय वह राजा अपने शरीर पर कुरते का आवरण भी सहन नहीं करता था ॥३४-३५॥
एक बार राजा को जीर्ण ज्वर हुआ। वैद्यों ने उस रानी के साथ मिलने से मना कर दिया ॥३६॥
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