कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय लम्बक २८५ इस प्रकार वत्सराज ने महायज्ञी की इच्छा और उस दिन को एक साथ ही समाप्त कर दिया ॥५२॥ दूसरे ही दिन समाचार जानकर मगध-नरेश ने दूत भेजा। उसने वत्सराज से उसका सन्देश कहा कि तुम्हारे मन्त्रियों ने हमें धोखा दिया। इसलिए ऐसा न करना कि हमारा संसार शोक-मय हो जाय ॥५३-५४॥ यह सुनकर वत्सराज ने उस दूत को पद्मावती के पास भेज दिया। वासवदत्ता के सम्मुख नम्रता प्रकट करती हुई पद्मावती ने भी उसी के पास आकर सन्देश सुनाने के लिए उस दूत का दर्शन दिया। नम्रता ही सती स्त्रियों का व्रत है॥५५-५६॥ दूत ने राजा का सन्देश कहा—'बेटी ! छल-कपट से वत्सराज तुम्हें विवाह करके ले गये तुम्हारा पति दूसरी स्त्री में अधिक अनुराग रखता है'इस शोक से मैंने कन्या के पिता होने का फल पा लिया। इस प्रकार पिता का सन्देश सुनाते हुए दूत से पद्मावती ने कहा—'हे भद्र ! मेरे वचन से पिता और माता को निवेदन करना कि आपलोग शोक क्या करते हैं। आर्यपुत्र (मेरे पति) मुझ पर अत्यन्त दया और स्नेह रखते हैं। वासवदत्ता भी बहिन के समान मुझमें स्नेह रखती है। यदि अपने सत्त्व के समान मेरे जीवन की रक्षा चाहते हो तो तुम्हें आर्यपुत्र (उदयन) के प्रति वैमनस्य न रखना चाहिए ॥५७-६०॥ इस प्रकार पद्मावती के द्वारा पिता के प्रति सन्देश दिये जाने पर, वासवदत्ता ने आतिथ्य-सत्कार करके दूत को विदा किया ॥६१॥ दूत के चले जाने पर पद्मावती अपने पितृगृह की बातों का स्मरण करके कुछ अनमनी-सी हो गई। उसे अनमनी देखकर वासवदत्ता के द्वारा बुलाये गये विदूषक वसन्तक ने वहाँ आकर कहानी कहना प्रारम्भ किया ॥६२-६३॥ सोमप्रभा और गुहसेन की कथा पृथ्वी का अलंकार पाटलिपुत्र नाम का एक नगर है। वहाँ पर धर्मगुप्त नाम का एक धनी व्यापारी वैश्य रहता था। ॥६४॥ उसकी चन्द्रप्रभा नाम की पत्नी एक बार गर्भवती हुई और उसने एक सर्वाङ्ग सुन्दरी कन्या उत्पन्न की ॥६५॥