भारतकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

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प्रथम लम्बक ३ प्रथम तरङ्ग¹ मंगलाचरण शिवजी की गोद में बैठी हुई पार्वती के दृष्टिपातों से मानो कामदेव द्वारा वेष्टित शिवजी का श्यामलवर्ण कंठ आपको सम्पत्ति प्रदान करे ॥१॥ सन्ध्याकालीन नृत्य के समय आकाश में बिखरी हुई प्राचीन तारिकाओं को फूँक से हटाकर, सीत्कार के बिन्दुओं से मानो नवीन तारिकाओं की सृष्टि करते हुए गणेशजी आपकी रक्षा करें ॥२॥ मैं समस्त पदार्थों को प्रकाशित करने के लिए दीपशिखा (लौ) के समान सरस्वती भगवती को प्रणाम करके बृहत्कथा के सार का संग्रह करता हूँ ॥३॥ प्रस्तावना इस संग्रह में प्रथम लम्बक का नाम कथापीठ, उसके अनन्तर दूसरे का नाम कथामुख लम्बक और तीसरे का नाम लावान(ण)क लम्बक³ है ॥४॥ इसके अनन्तर नरवाहनदत्त नामक चतुर्थ लम्बक है। चतुर्दारिका लम्बक पाँचवाँ और मदनमञ्चुका लम्बक छठा है ॥५॥ इसके बाद रत्नप्रभा लम्बक सातवाँ और सूर्यप्रभ लम्बक आठवाँ है ॥६॥ इसके बाद नवाँ अलङ्कारवती लम्बक दसवाँ सम्बक शक्तियशा और इसके अनन्तर ग्यारहवाँ वेला नामक लम्बक है ॥७॥ इसके पश्चात् बारहवाँ शशांकवती लम्बक तेरहवाँ मदिरावती लम्बक चौदहवाँ महा- भिषेकवती लम्बक और पन्द्रहवाँ पंच लम्बक है ॥८॥ इसके अनन्तर सोलहवाँ सुरतमंजरी लम्बक सत्रहवाँ पद्मावती लम्बक तथा अठारहवाँ विषमशील नामक लम्बक है ॥९॥ मूल बृहत्कथा में जो कुछ है उसी का इस ग्रंथ में संग्रह किया गया है। मूलग्रन्थ से इसमें तनिक भी अन्तर नहीं है। हाँ विस्तृत कथाओं का संक्षिप्तमात्र किया गया है और भाषा का भेद है (उसकी भाषा पैशाची थी और इसकी संस्कृत है) । १० ।। मैंने यथासम्भव मूलग्रन्थ की औचित्य-परम्परा की रक्षा की है और कुछ नवीन काव्यांगों की योजना करते हुए भी मूलकथा के रस का विघात नहीं होने दिया है ॥११॥ मुझसे यह ग्रन्थ-निर्माण-प्रयत्न पाण्डित्य-प्रसिद्धि के लोभ से नहीं किया गया है किन्तु अनेक लम्बी कथाओं के जाल को स्मरण रखने की सुविधा से किया गया है ॥१२॥ १ तरङ्गों की रचना कथासरित्सागर के रचयिता श्रीसोमदेवभट्ट ने अवान्तर कथाओं के विभाग के लिए की है। मूल कथा में तरङ्ग नाम का विभाग नहीं था क्योंकि तरङ्ग शब्द का सम्बन्ध सागर के साथ उपयुक्त होता है। २ कथासरित्सागर में कामदेव के अवतार नरवाहनदत्त का चरित्र और उसका विजय वर्णित है। अतः कवि ने मंगलाचरण में ही काम की विजय की सूचना दी है। ३ सोमदेव ने लम्बकों का जो क्रम प्रदर्शित किया है, वह मूल बृहत्कथा के ही अनु- सार है, या स्वतन्त्र इसका निश्चय नहीं है। इससे पूर्व महाकवि क्षेमेन्द्र ने 'वृहत्कथामंजरी' के नाम से बृहत्कथा का जो भाषान्तर किया है उसमें लम्बकों का क्रम सागर से भिन्न है। इसका विवरण भूमिका में देखिए ।—अनु.