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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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तृतीय लम्बक १११९ उस दिन सबबेर (सारा दिन) महाराज उत्सव में मग्न रहे। जबतक सूर्य के साथ सारी नागरिक जनता सिन्दूर से लाल न हो गई, अर्थात् सायंसंध्या तक सामान्य प्रजा के उत्सव चलते रहे ॥१२२॥ दूसरे दिन राजा आदित्यसेन ने उस मठ से विदूषक व गाँव उसमें रहनेवाले सभी ब्राह्मणों को बुलवाया ॥१२३॥ सभा में रात का समस्त वृत्तान्त सुनाकर राजा ने उपकार करनेवाले विदूषक को एक हजार गाँव पुरस्कार (इनाम) में दिये। और उस उस उत्तम छत्र छाया व अपने पुरोहितों में नियुक्त करके लगाने के लिए छत्र और सवारी के लिए घोड़ा दिया। सभी सभासद् राजा की इस उदारता को आश्चर्य से देखने लगे ॥१२४-१२५॥ इस प्रकार वह ब्राह्मण उसी समय राजा के सामन्त के समान हो गया। सच है महान् व्यक्तियों का उपकार करना निष्फल नहीं होता ॥१२६॥ उस महान् हृदय विदूषक ने भी राजा से पाये हुए गाँवों को मठ में रहनेवाले सभी ब्राह्मणों में समान भाव से बाँट दिया। और स्वयं राजा का आश्रित होकर उसकी सभा में रहने लगा एवं उन सभी ब्राह्मणों के साथ गाँव की आय द्वारा समान रूप से जीवन-निर्वाह करने लगा ॥१२७-१२८॥ कुछ समय के अनन्तर बिना परिश्रम प्राप्त राजवृत्ति की आय से मदोन्मत्त वे सभी मठ- वासी ब्राह्मण अपनी-अपनी प्रधानता चाहते हुए परस्पर झगड़ने लगे। उसमें दुष्ट ग्रहों के समान सात ब्राह्मण एक गुट बनाकर गाँवों के कार्यों में बाधा पहुँचाने लगे। उन ब्राह्मणों की इस प्रकार उच्छृंखलता करने पर विदूषक उदासीन (तटस्थ) हो गया। धैर्यशाली व्यक्तियों के लिए छोटी-छोटी बातों में तटस्थता ही अच्छी रहती है ॥१२९-१३१॥ इस प्रकार जब वे आपस में झगड़ रहे थे तब चण्डपार नाम का एक शठ कपटी ब्राह्मण मठ में आया। वह (ब्राह्मण) काना होने पर भी दूसरे के न्याय के लिए स्पष्ट दृष्टा था और कुबड़ा होने पर भी वाणी से स्पष्ट बोलता था ॥१३२-१३३॥ वह उनसे बोला—'अरे मूर्खो ! तुम भिखमंगों ने किसी तरह यह महती (सम्पत्ति) प्राप्त की है, उसे आपस में लड़कर क्यों नष्ट कर रहे हो। यदि इस प्रकार लड़ोगे तो फिर भीख मांगोगे ॥१३४-१३५॥ १. सृष्टि के प्रारम्भ में सात ग्रह एक राशि में थे और प्रलयकाल में भी वे एक राशि में एकत्र होंगे—ऐसा ज्योतिष-सिद्धान्तवादियों का मत है। ज्योतिष-सिद्धान्त में अनेक कारणों का एक राशि पर एकत्र होना अनिष्टकारी होता है।