कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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Read in contextतृतीय लम्बक १२१ बिना नेता का और भाग्य के आधार पर छोड़ा हुआ एक स्थान अच्छा है किन्तु सर्वनाश करनेवाले बहुत नेताओं का होना अच्छा नहीं ॥१३६॥ यह विदूषक का दोष है कि उसने तुमलोगों की उपेक्षा करके तुम्हें स्वतन्त्र छोड़ दिया। इसलिए मेरे कहने से किसी एक को नेता बना लो इसके द्वारा तुम्हारी सम्पत्ति स्थिर रहेगी और बढ़ती रहेगी। चक्रधर के ऐसा कहने पर वे सभी अपने-अपने को नेता मानने के लिए तैयार हुए। तब चक्रधर ने उन्हें महामूर्ख समझ कर कहा—आपस में लड़ते हुए तुमलोगों के लिए मैं शर्त निश्चित करता हूँ यहाँ के श्मशान में फाँसी से मारे गये तीन चोर झूल रहे हैं॥१३७-१३९॥ उन तीनों की नाक काटकर जो वीर ले आये वह तुममें प्रधान (नेता) हो सकता क्योंकि वीर ही स्वामी बन सकता है ॥१४० ॥ चक्रधर द्वारा इस प्रकार कहे गये ब्राह्मणों को विदूषक ने कहा—'इस शर्त को मान लो क्या हानि है' ? ॥१४१॥ इस कार्य के करने में असमर्थ वे बोले—'हम यह नहीं कर सकते जो समर्थ हो वह करे, हम शर्त मानने को तैयार हैं। तब विदूषक बोला—'मैं यह कार्य करता हूँ। रात को श्मशान से उनकी नाक काटकर लाता हूँ ॥१४२-१४३॥ तब वे मूर्ख उससे बोल उठे—'ऐसा करने पर तुम हमारे नेता बनोगे—इस निश्चय पर हम दृढ़ हैं'॥१४४॥ इस प्रकार शर्त लगाकर रात आने पर उन ब्राह्मणों से कहकर विदूषक श्मशान में गया ॥१४५॥ स्मरण करते ही उपस्थित होनेवाले खड्ग को हाथ में लेकर अपने रूप के समान भीषण श्मशान में गया ॥१४६॥ डाकिनी शाकिनी आदि के शब्दों से युक्त चीख और कौआ के शब्दों से भीषण मुँह से आग उगलते हुए गीदड़ों की वह्नि-ज्वाला से फैलती हुई चिता-वह्नि से डरावने उस श्मशान के बीच उसने सूली पर चढ़े हुए, नाक कटने के भय से मानों ऊपर की ओर मुँह किये हुए, तीन चोरों को देखा ॥१४७-१४८॥ विदूषक जब उनके समीप पहुँचा तब वैतालों से आक्रान्त वे तीनों मुर्दे उसे मुक्कों से मारने लगे ॥१४९॥ निडर विदूषक ने भी उन्हें खड्ग से मारा। यह सच है कि वीर पुरुषों के हृदय भय से विचलित ही नहीं होते ॥१५० ॥ ४१