कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय लम्बक १६९
उसी राजपुत्र के द्वारा राजा ब्रह्मदत्त की युद्ध-सम्बन्धी गति-विधियों का ज्ञान प्राप्त करना था ॥७९॥
तदनन्तर योग नामक ब्रह्मदत्त के मन्त्री ने जाते हुए वत्सराज के मार्ग में विविध प्रकार के विनाश के जाल बिछा दिये ॥८०॥
यात्रा में आनेवाली प्रत्येक सड़क पर आनेवाले पेड़, लताओं, कुँओं, तालाबों, घास, फूल आदि में जहरीले द्रव्यों का योग करा दिया ॥८१॥
वत्सराज की सेना में 'विषकन्या'¹ को बाजारू वेश्याओं के रूप में और रात में चोरी के आघात करनेवाले गुप्तचरों को वत्सराज की सेना में भेजा ॥८२॥
उस बनावटी सिद्ध कापालिक ने राजपुत्र से सारी बातें जानकर अपने सहायकों द्वारा यौगन्धरायण को शीघ्र सूचनाएँ प्रेषित कीं ॥८३॥
यौगन्धरायण जासूसों से यह सब जानकर मार्ग में विष से दूषित तृण, जल आदि का विपरीत योगों से शोधन कर देता था। उसने सेना-शिविर में आनेवाली अपूर्व स्त्रियों के वध की आज्ञा दे दी और गुप्त घातकों को सेनापति रुमण्वान् के साथ खोज-खोजकर मरवा डाला ॥८४-८५॥
यह जानकर कूटनीति के विफल होने पर ब्रह्मदत्त ने विशाल सेना के साथ सब दिशाओं को घेरकर आक्रमण करते हुए वत्सराज को अजेय समझा ॥८६॥
ऐसा सोचकर और मन्त्रियों से सम्मति करके सन्धि-दूत को भेजकर सिर पर अंजलि रखकर प्रणाम करता हुआ ब्रह्मदत्त निकट आये हुए वत्सराज के समीप स्वयं गया ॥८७॥
वत्सराज ने भी उपहार देकर स्वयं आये हुए राजा ब्रह्मदत्त का समुचित सम्मान किया क्योकि वीर पुरुष प्रणति से प्रसन्न हो जाते हैं ॥८८॥
वत्सराज के दिग्विजय की कथा
इस प्रकार, काशी-नरेश के विजित हो जाने पर पूर्व दिशा को शान्त करता हुआ, मृदु-नम्र राजाओं को सुराता हुआ और कठोर शत्रुओं को वृक्षों को वायु के समान उखाड़ता हुआ वत्सराज चलती हुई लहरों से घूरते हुए एवं वंग-देश के विजय त्रास से मानों काँपते हुए पूर्व समुद्र के तट पर पहुँचा ॥८९-९०॥
वत्सराज ने पूर्व समुद्र-तट पर एक जयस्तम्भ गाड़ दिया मानो पाताल के लिए अभय की प्रार्थना करने के निमित्त नागराज उठकर आया हो ॥९१॥
१. विषकन्याएँ दो प्रकार की होती हैं, एक तो ऐसे नक्षत्र या लग्न में उत्पन्न होती हैं कि जिनके सहवास से व्यक्ति तुरन्त मर जाता है। दूसरी, प्रारम्भ से ही विष खिलाकर कृत्रिम विषकन्याएँ बनाई जाती हैं, जिनके सम्पर्क में आते ही पुरुष की मृत्यु हो जाती है।—अनु. ४७