भारतकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

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कलिङ्ग-देशों का राजाओं ने नम्र होकर कर दे देने पर (पराजित होकर अधीनता स्वीकार कर लेने पर) उस यशस्वी वत्सराज का यश महेन्द्र पर्वत पर चढ़ गया ॥९२॥ महेन्द्र पर्वत के अपमान से डरे हुए, अतएव अनुगमन करते हुए विन्ध्य-पर्वत के शिखरों के समान हाथियों से उस देश के राजाओं को जीतकर (वत्सराज) दक्षिण दिशा की ओर गया ॥९३॥ दक्षिण दिशा में शरत्काल के समान राजा ने मेघों के समान शत्रुओं का (दक्षिण के राजाओं को) निःसार और श्वेत बदनवाले गर्जना-रहित और पर्वतों पर आश्रय लेनेवाला बना दिया ॥९४॥ भीषण संघर्ष करनेवाले उस राजा उदयन ने कावेरी का उल्लङ्घन करके उसे और चोल देश के राजा की कीर्ति को कलुषित कर डाला अर्थात् चोल' राजा को पराजित कर दिया ॥९५॥ राजा उदयन ने करा से मारे हुए मुरल देश के राजाओं के सिरों की उन्नति का ही सहन नहीं किया प्रत्युत करा से विताड़ित उस देश की स्त्रियों की कुचोन्नति को भी सहन नहीं किया ॥९६॥ राजा उदयन के हाथियों ने सात धाराओं में विभक्त गोदावरी का जल पीया था उठ उन्होंने उस जल को मद के बहाने सात स्थानों से निकाल दिया³ ॥९७॥ दक्षिण-विजय करने के अनन्तर वत्सराज नर्मदा नदी को पार करके उज्जयिनी में आया । वहाँ उसके श्वशुर (वासवदत्ता के पिता) ने उसकी अगवानी की ॥९८॥ वहाँ राजा उदयन मालाओं से शिथिल केशपाशों से दूनी शोभा धारण करते हुए मालव रमणियों के कटाक्षों का लक्ष्य (शिकार) बन गया ॥९९॥ श्वशुर द्वारा सत्कार किया गया उदयन उज्जयिनी में कुछ दिनों तक ठहर गया । वहाँ उसकी ऐसी आवभगत हुई कि वह अपने घर के सुखों को भी भूल गया ॥१००॥ पिता की गोद में लोटती हुई वासवदत्ता अपने बाल्यकाल का स्मरण करके महारानी के सुख में भी निःस्पृह हो गई ॥१०१॥ राजा चण्डमहासेन भी जैसे वासवदत्ता से आनन्दित हुआ वैसे ही पद्मावती से भी आनन्द अनुभव करता था ॥१०२॥ कुछ रातें उज्जयिनी में व्यतीत करके, ससुर की सेनाओं से युक्त वत्सराज पश्चिम दिशा की ओर चला ॥१०३॥ १ देखिए परिशिष्ट । २ देखिए परिशिष्ट । ३ देखिए रघु० सर्ग ४—मसूयतेव तन्माला सप्तधैव प्रसुस्रुवुः ।