भारतकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

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तृतीय लम्बक १७३ अवश्य ही राजा उदयन की तलवार उसके प्रतापानल की धूमरेखा के समान थी क्योंकि उसने लाट देश की स्त्रियों की आँखों को उमड़ते हुए आँसुओं से कङ्कण कर दिया था॥१४॥ यह राजा समुद्र-मन्थन के लिए कहीं मुझे उखाड़ न ले इसी भय से वायु से काँपते हुए पत्तोंवाला मन्दराचल पर्वत मानों काँपने लगा॥१५॥ राजा उदयन सचमुच सूर्य से विलक्षण कोई तेजस्वी है जिसका पश्चिम में उदय हुआ॥१६॥ पश्चिम-विजय करने पर राजा उदयन कुबेर से लक्षित अलका-नगरी से विभूषित कैलास के हास से सुन्दर उत्तर दिशा को चला॥१७॥ वहाँ पर घोड़ों की सेना से युक्त उदयन ने सिन्धुराज को वश में करके म्लेच्छों का इस प्रकार संहार किया जैसे राम ने राक्षसों का किया था। विक्षुब्ध समुद्र की लहरों के समान पारसी घोड़ों के झुण्ड उदयन के हाथी-रूपी तटवनों से जाकर टकराये॥ शत्रुओं से कर लेने वाले उस महापुरुष उदयन ने हाथ में चक्र लिये हुए विष्णु के समान पापी पारस के राजा का सिर राहु के समान काट डाला॥१८-११॥ हूणों का विनाश करनेवाले राजा उदयन की कीर्ति दूसरी गंगा के समान हिमाचल पर विचरण करने लगी॥११२॥ हिमाचल में कन्दराओं में भय से त्रस्त (छिपे हुए) शत्रुवाले राजा की सेना के कोलाहल की केवल प्रतिध्वनि ही सुन पड़ती थी॥११३॥ कामरूप (असाम) देश का राजा बिना छत्र के सिर से उसे (उदयन को) प्रणाम करता हुआ जो हतप्रभ हो गया वह आश्चर्य की बात नहीं॥११४॥ उस (कामरूप-नरेश) द्वारा जंगम पर्वतों के समान कर के रूप में दिये गये हाथियों के साथ सम्राट् उदयन दिग्विजय-यात्रा से लौट आया॥११५॥ वह वत्सराज इस प्रकार पृथ्वी को जीतकर सेना के साथ पद्मावती के पिता मगध नरेश के नगर (राजगृह) लौट आया॥११५॥ मगध-नरेश दोनों महारानियों के साथ उसे उपस्थित देखकर इस प्रकार प्रसन्न हुआ जैसे निशा में चाँदनी-युक्त चन्द्रमा के होने पर कामदेव प्रसन्न होता है॥११६॥ पहले छिपे रूप में और पश्चात् प्रकट रूप में स्थित वासवदत्ता को उसने नम्रता के कारण अधिक रूप में माना॥११७॥