कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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और ब्रह्मा के कहने पर प्राणियों के चित्त में कामदेव का जन्म होना भी स्वीकार किया जिससे सृष्टि का विच्छेद न हो। उन्होंने अपने चित्त में भी कामदेव का स्थान दिया। इससे प्रसन्न होकर ब्रह्मा चले गये और पार्वती प्रसन्न हुईं॥७०-७१॥
कुछ दिन व्यतीत होने पर एक बार एकान्त में शिव-पार्वती का समागम हुआ ॥७२॥
स्वामि कार्त्तिकेय की उत्पत्ति
सैंकड़ों वर्ष व्यतीत होने पर भी क्रीड़ा समाप्त न हुई प्रत्युत उससे तीनों लोक काँप गये। संसार के नाश के भय से शिव की क्रीड़ा में विघ्न डालने के लिए देवताओं ने ब्रह्मा की आज्ञा से अग्नि का स्मरण किया। स्मरण करते ही उपस्थित हुआ अग्नि शिवजी के भीषण क्रोध का स्मरण करके देवताओं से भागकर जल में जा छिपा ॥७३-७५॥
जल में अग्नि के ताप से तप्त हुए मेंढकों ने अग्नि को खोजते हुए देवताओं से जल में छिपे अग्नि का पता बता दिया ॥७६॥
अग्नि मेंढकों को अस्पष्ट वाणी-शक्ति हीन का शाप देकर और छिपकर मन्दराचल पर चला गया। वहाँ देवताओं ने वरुण के डर से शम्भूक (घाघा) के रूप में उस अग्नि को देखा। वहाँ उसने मन्दुक नाम से देवताओं को दर्शन दिया ॥७७-७८॥
अग्नि ने शुकों की जिह्वा का उलटा का रूप दिया और देवताओं के स्तुति करने पर अग्नि ने देवताओं के कार्य को स्वीकार कर लिया ॥७९॥
अग्नि ने जाकर अपनी प्रभों से शिवजी को काम-क्रीड़ा से विरत करके और प्रणाम करके देवताओं का कार्य निवेदन किया। प्रसन्न होकर शिवजी ने बहिर् में ही अपना वीर्य स्खलित कर दिया क्योंकि उसे पार्वती और अग्नि दोनों ही धारण करने में असमर्थ थे ॥८०-८१॥
'दैव मुझपर कुपित होकर पुत्र नहीं प्राप्त किया—'यह कहती हुई पार्वती को शिव ने कहा—॥८२॥
'इस वीर्य के बिन्दुओं (कणों) का गुहक के रूप में एक विघ्न-हर्ता उत्पन्न हुआ। इसलिए तपस्या पूरा होने पर भविष्य में हम दोनों का पुत्र उत्पन्न होगा' ॥८३॥ २४