भारतकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

पृष्ठ 428, कुल 876 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 428

तृतीय लम्बक १८७ शिवजी से इस प्रकार कही गई पार्वती ने विघ्ननाशक गणेश का पूजन किया और उस शिवजी के अमोघ वीर्य से अग्नि को गर्भ रह गया॥८४॥ शिवजी के तेज को धारण किये हुए अग्नि ऐसा चमक रहा था जैसे सूर्य के तेज के अन्दर प्रविष्ट होने से आग चमकती है॥८५॥ कुछ समय के अनन्तर अग्नि ने उस अगाध शिव के तेज को गंगा में वमन करके गिरा दिया और गंगा ने शिव की आज्ञा से उसे सुमेरु पर्वत पर वह्नि-कुंड में छोड़ दिया॥८६॥ वहाँ पर शिवजी के गणों से रक्षा किया जाता हुआ वह तेज एक हजार वर्ष के अनन्तर छह मुखवाले कुमार के रूप में उत्पन्न हुआ॥८७॥ तब गौरी (पार्वती) के द्वारा नियुक्त छह कृत्तिकाओं के स्तनों से छहमुखों द्वारा दूध पीकर वह कुमार कुछ दिनों में बड़ा हो गया॥८८॥ इसी बीच तारकासुर से भगाया हुआ इन्द्र युद्ध छोड़कर सुमेरु पर्वत की घाटियों में छिप रहा था॥८९॥ ध्वनियों के साथ देवगण षङ्मुख कुमार की शरण में गये कुमार ने भी उनकी रक्षा की॥९०॥ यह जानकर और राज्य को हारा हुआ समझकर इन्द्र को क्षोभ हुआ और उसने ईर्ष्या- युक्त होकर कुमार से युद्ध किया॥९१॥ इन्द्र के वज्र के प्रहार से षण्मुख के अंग से शाख और विशाख दो अनुपम तेजस्वी बालक उत्पन्न हुए॥९२॥ पुत्रों के साथ इन्द्र के पराक्रम को दबाते हुए बालक षण्मुख को देखकर शिवजी स्वयं आये और उसे बड़े यत्न से शांत किया और कहा—तुम तारकासुर को मारने और इन्द्र की रक्षा करने के लिए उत्पन्न हुए हो इसलिये उसी अपने यथार्थ कार्य को करो ॥ ९३-९४॥ इसी समय प्रसन्न हुए इन्द्र ने कुमार का सेनाधिपत्य के लिए अभिषेक किया ॥ ९५॥ अभिषेक के लिए कलश उठाते हुए इन्द्र का हाथ जड़ रह गया तब इन्द्र को क्षोभ हुआ। यह देखकर शिवजी ने कहा—'इन्द्र ! तुमने सेनापति का निर्वाचन करते हुए गणेश की पूजा नहीं की थी उसी से यह विघ्न हुआ अब उनका पूजन करो ॥ ९६-९७॥ ऐसा सुनकर गन्ध-पुष्प आदि द्वारा इन्द्र ने गणेश को पूजे और कुमार के सेनापत्य का अभिषेक निर्विघ्न हुआ॥ ९८ ॥

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · पृष्ठ 428, कुल 876 में से · BharatKosha