कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
पृष्ठ 44, कुल 876 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रथम लम्बक १३ द्वितीय तरंग वररुचि (पुष्पदन्त) की कथा मानव-शरीर धारण किये हुए पुष्पदन्त नामक यक्ष वररुचि¹ एवं कात्यायन के नाम से प्रसिद्ध हुआ ।।१।। समस्त विद्याओं का पूर्ण अध्ययन तथा सम्राट नन्द का मन्त्रित्व करके वह (कात्यायन) एक बार खिन्न होकर विन्ध्यवासिनी देवी के दर्शन करने के लिए आया ।।२।। तपस्या से आराधित विन्ध्यवासिनी देवी ने स्वप्न में वररुचि को एक आदेश दिया। उस आदेश के अनुसार वह काणभूति को देखने के लिए विन्ध्यारण्य में गया ।।३।। बाघ और वानरों से भरे हुए, जल-रहित एवं सूखे वृक्षों से व्याप्त उस विन्ध्यारण्य में उसने अत्यन्त ऊँचे और विस्तृत बरगद-वृक्ष को देखा ।।४।। पुष्पदन्त ने उस वटवृक्ष के पास सैकड़ों पिशाचों से घिरे हुए शालवृक्ष के समान लम्बे काणभूति को देखा ।।५।। काणभूति ने कात्यायन को देखकर उसके चरण छूकर प्रणाम किया और कुछ समय के उपरान्त विश्राम कर लेने पर कात्यायन ने काणभूति से पूछा ।।६।। 'हे काणभूते ! ऐसे सदाचारी होकर तुम ऐसी हीन गति को कैसे प्राप्त हुए ? कात्यायन के स्नेहपूर्ण प्रश्न को सुनकर काणभूति ने कहा ।।७।। मुझे स्वयं यह ज्ञात नहीं है कि मैं इस गति को कैसे प्राप्त हुआ किन्तु उज्जयिनी नगरी में—श्मशान में—शिवजी से जो मैंने सुना है वह तुम्हें कहता हूँ सुनो ।।८।। एक बार पार्वती के यह पूछने पर कि 'भगवन् ! कपाल-मुंडों से और श्मशानों से तुम्हें अधिक प्रेम क्यों है ?' शिवजी ने उत्तर दिया ।।९।। 'प्राचीनकाल में प्रलय उपस्थित होने पर सारा संसार जलमय हो गया था। उस समय मैंने अपनी जाँघ को चीरकर उस जल में रक्त की एक बूँद डाल दी ।।१०।। वह रक्त-बिन्दु जल के भीतर अंडे के रूप में परिणत हो गया। उसे फोड़ने पर उसमें से एक पुरुष निकला। उस पुरुष को देखकर सृष्टि के लिए मैंने प्रकृति की रचना की ।।११।। इस प्रकार उन दोनों ने अन्यान्य प्रजापतियों को उत्पन्न किया और उन प्रजापतियों ने अन्य प्रजाओं का उत्पादन किया। इसलिए, हे देवि ! वह प्रथम पुरुष सबसे पुराना होने के कारण जगत् में पितामह के नाम से प्रसिद्ध हुआ ।।१२।। इस प्रकार चर और अचर-विश्व का सर्जन कर उस पुरुष को यह दर्प हो गया कि 'मैंने इतनी बड़ी रचना कर डाली। उसके दर्प से क्रुद्ध होकर मैंने उस पुराण-पुरुष का सिर काट डाला ।।१३।। १ वररुचि प्राचीन महावैयाकरण हैं। उसका दूसरा नाम कात्यायन भी है जो उसके गोत्र से सम्बन्ध रखता है। इस नाम के अनेक विद्वान् हुए हैं। इसका विवेचन परिशिष्ट प्रकरण में किया गया है।