कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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चतुर्थ लम्बक ४९७ यहाँ शान्तिकर नाम का हमारा एक पुरोहित रहता है, वह इस देश का नहीं, परदेशी है। मैं समझती हूँ, वह तुम्हारा देवर होगा॥१२५॥ ऐसा कहकर उत्कण्ठित ब्राह्मणी की रात्रि में उसी प्रकार व्यवस्था करके प्रातःकाल ही रानी ने पुरोहित को बुलाकर उसके कुल और देश का पता पूछा॥१२६॥ उसके अपने कुल का पता बताने पर भली भाँति निश्चय कर रानी ने 'यह तुम्हारी भाभी है'—ऐसा कहकर उस ब्राह्मणी को उसे दिखाया॥१२७॥ परिचय होने पर और अपने भाई की मृत्यु का समाचार जानने पर शान्तिकर अपनी भाभी को अपने घर ले गया॥१२८॥ घर जाकर पिता और भाई के लिए समुचित शोक प्रकट करके दोनों बच्चों-सहित भाभी को उसने धैर्य प्रदान किया॥१२९॥ रानी वासवदत्ता ने भी उन दोनों बालकों को उत्पन्न होनेवाले अपने पुत्र का पुरोहित नियुक्त कर दिया॥१३०॥ रानी ने ही उन दोनों पुत्रों में से बड़े का नाम शान्तिसोम और छोटे का नाम वैश्वानर रखा। साथ ही उनके लिए प्रचुर सम्पत्ति प्रदान की॥१३१॥ अन्धे के समान जीव के आगे-आगे चलनेवाला और अपने कर्मों द्वारा फल की ओर ले जानेवाला भाग्य ही होता है, पुरुषार्थ तो एक निमित्तमात्र है॥१३२॥ यही कारण है कि वह ब्राह्मणी दोनों बालक और शान्तिकर इधर-उधर से आकर प्रचुर राज-संपत्ति पाकर परस्पर मिल गये॥१३३॥ इस प्रकार कुछ दिन बीतने पर एक बार एक कुम्हारिन अपने पाँच पुत्रों को साथ लेकर मिट्टी के कुछ पात्रों-सहित वहाँ आई॥१३४॥ उसे अपने भवन में देखकर रानी ने समीप बैठी हुई पुरोहितानी ब्राह्मणी से कहा— 'सखि! देखो इसके पाँच-पाँच लड़के हैं और मुझे अभी तक एक भी नहीं है, वह इतनी पुण्यवती है। गरीब होकर भी यह मेरी जैसी निपूती नहीं है॥१३५-१३६॥ तब पिंगलिका बोली—'महारानी! पाप के फलस्वरूप अधिक सन्तान कष्ट देती है और दरिद्रा के ही होती है॥१३७॥ तुम्हारे समान उच्च लोगों की अल्पकाल सन्तान होती है, वह उत्तम होती है। जल्दी न करो। शीघ्र ही अपने कुल के योग्य सन्तान प्राप्त करोगी॥१३८॥ पिंगलिका के इस प्रकार कहने पर भी पुत्र के लिए उत्कण्ठित रानी चिन्ता करने लगी॥१३९॥