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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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चतुर्थ लम्बक ४५१ तदनन्तर मैं उस मनोवती पत्नी और अभिन्न हृदय मित्र भीकराज के साथ सुखपूर्वक बसभी में रहने लगा ॥१५१ ॥ वह भीकराज अपने देश का प्रेम छोड़कर अधिकतर हमारे घर में ही रहने लगा ॥१५१॥ परस्पर उपकार के कार्यों में सर्वदा व्यपृत रहनेवाले हम दोनों मित्रों का समय व्यतीत हुआ ॥१५२॥ कुछ ही दिनों में मनोवती द्वारा मेरा पुत्र उत्पन्न हुआ मानों सारे कुटुम्ब के हार्दिक उत्सव का मूर्तरूप वह प्रकट हुआ हो ॥१५३॥ हिरण्यदत्त नामक वह कुमार, धीरे-धीरे बड़ा हुआ और पढ़ने-लिखने के पश्चात् मैंने उसका विवाह कर दिया ॥१५४॥ मेरे पिता यह देखकर और अपने जीवन का अन्तिम फल समझकर वृद्धावस्था में शरीर त्याग करने के लिए गंगातट पर चले गये ॥१५५॥ पिता के चले जाने पर शोक से अत्यन्त दुःखी होकर मैंने अपने बन्धु-बान्धवों के धैर्य देने और समझाने-बुझाने पर घर-गृहस्थी का भार उठाना स्वीकार किया ॥१५६॥ उस समय एक ओर तो मनोवती के भोले-भाले मुंह को देखता और दूसरी ओर मित्र पद्मराज की मित्रता —ये दो मेरे मनोविनोद के साधन थे ॥१५७॥ सुपुत्र के कारण असीम आनन्ददायक सपती के कारण मनोरम एवं सच्चे मित्र के समागम से सुखद से मेरे दिन व्यतीत हुए ॥१५८॥ कुछ समय के पश्चात् मुझ वयस्क को 'बेटा अबतक घर में क्या कर रहे हो' मानों इस प्रकार प्रेमपूर्वक हित वचन कहती हुई वृद्धावस्था ने मेरी ठोड़ी या दाढ़ी पकड़ ली ॥१५९॥ इस कारण अकस्मात् वैराग्य उत्पन्न होने पर वन में जाने की इच्छा से मैंने कुटुम्ब का भार अपने पुत्र को दे दिया ॥१६०॥ तदनन्तर मैं अपनी पत्नी के साथ कालंजर नामक पर्वत पर चला गया और भीकराज मेरे प्रेम से राज्य को छोड़कर मेरे साथ हो लिया ॥१६१॥ वहाँ जाकर मैंने अपनी पूर्वजन्म की विद्याधर जाति का स्मरण किया और वन्द्य होनेवाले पित्र जी के शाप का भी समूचा स्मरण किया ॥१६२॥ उस शाप को मैंने अपनी पत्नी मनोवती तथा मित्र भीकराज को भी बता दिया ॥१६३॥ तदनन्तर मानव-शरीर को छोड़ने की इच्छा से मैंने अन्तिम समय यही कामना की है कि अगले जन्म में भी ये ही दोनों मेरी पत्नी और मित्र बनें। इस प्रकार मनमें शंकर का ध्यान कर पर्वत (हिमालय) की चोटी¹ से गिरकर उक्त पत्नी और मित्र के साथ शरीर का त्याग कर दिया ॥१६४-१६५॥ १ इसको भृगुपात—भृगुप्रपात कहते हैं इस पर चढ़कर प्राण-त्याग करने से अगले जन्म में मनोवाञ्छित सिद्धि होती है।—अनु.