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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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चतुर्थ लम्बक ४५३ वह जातिस्मर मैं अब समुत्पन्न जीमूतवाहन नाम से विद्याधर-कुल में उत्पन्न हुआ वही शंखेन्द्र तुम मित्रावसु हो जो शिवजी की कृपा से सिद्धों के राजा विश्वावसु के पुत्र हो।।१६६ १६७।। हे मित्र वह मेरी विद्याधरी पत्नी मनोवती मलयवती नाम से तुम्हारी बहिन है। वह तुम्हारी बहिन मेरे पूर्वजन्म की पत्नी है और तुम भी मेरे उसी जन्म में मित्र हो। अतः मैं इससे विवाह करना उचित समझता हूँ ।।१६८ १६९।। किन्तु इसके पूर्व तुम मेरे पिता से निवेदन करो। उनके स्वीकार करने पर ही तुम्हारा यह अभीष्ट सिद्ध होगा ॥१७०॥ जीमूतवाहन और मलयवती का विवाह जीमूतवाहन से ऐसा सुनकर प्रसन्नचित्त मित्रावसु ने मेरे पिता के समीप जाकर यह प्रस्ताव उपस्थित किया। उनके द्वारा समर्थन प्राप्त कर लेने पर सन्तुष्ट मित्रावसु ने यही प्रस्ताव अपनी माता और पिता से किया ॥१७१॥ वे यह सुनकर अभिलषित सम्पत्ति मिल जाने के समान प्रसन्न हुए और उन्होंने प्रसन्नता- पूर्वक इस सम्बन्ध को स्वीकार किया ॥१७२॥ तदनन्तर युवराज मित्रावसु ने अपने विवाह की तैयारी की और जीमूतवाहन ने भी विधिपूर्वक मलयवती का पाणिग्रहण किया ॥१७३॥ आकाशचारी चारणों के गीतों से मनोहर उनका विवाह-संस्कार सम्पन्न हुआ। इस विवाह में सिद्धों और विद्याधरों के झुंड भी सम्मिलित हुए थे ।।१७४ १७५।। विवाह के उपरान्त जीमूतवाहन अपनी पत्नी के साथ अपने राजसी ठाटबाट से वहाँ रहने लगा ॥१७६॥ एकबार वे अपने साले मित्रावसु के साथ समुद्र-तट के जंगलों की सैर करता हुआ टहल रहा था कि इतने में उसने एक व्याकुल युवा पुरुष को अपनी ओर आते हुए देखा और उसके पीछे एक वृद्धा स्त्री 'हाय बेटा हाय बेटा' कहकर रोती-बिलखती आ रही थी ॥१७७-१७८॥ पीछे आते हुए सैनिक के समान किसी पुरुष ने एक ऊँची चट्टान के समीप लाकर उसे छोड़ दिया था॥१७९॥