कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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Read in contextचतुर्थ लम्बक ४५५ 'तू कौन है तथा क्या चाहता है ? माता तेरे सम्बन्ध में शोक क्यो कर रही है?' इत्यादि। जीमूतवाहन ने उस युवक से यह सब वृत्तान्त पूछा। उत्तर में उसने जीमूतवाहन का सारा वृत्तान्त इस प्रकार कहा—॥१८८॥ कद्रू और विनता की कथा प्राचीन समय में कश्यप की दो पत्नियां विनता और कद्रू किसी कथा के प्रसंग में परस्पर विवाद कर बैठीं ॥१८९॥ कद्रू ने कहा कि सूर्य के घोड़े काले हैं और विनता ने कहा श्वेत। बस इसी बात पर उन्होंने आपस में शर्त लगा ली कि जिसकी बात झूठी होगी वह सच्ची बातवाली की दासता करेगी ॥१९०॥ जीतने की इच्छा रखनेवाली कद्रू ने अपने पुत्र सर्पों के द्वारा विषैली फुत्कार से सूर्य के घोड़ों का रंग काला करवा दिया और छल से जीती हुई कद्रू ने विनता को दासी बना लिया। सच है कि स्त्रियों की पारस्परिक ईर्ष्या भी दुर्लङ्घ्य होती है ॥१९१-१९४॥ यह जानकर विनता के पुत्र गरुड़ ने दास्यि के साथ अपनी माता की दासता की मुक्ति के लिए कद्रू से प्रार्थना की ॥१९५॥ तब कद्रू के पुत्र नागगण आपस में विचार करके बोले कि 'हे गरुड़ ! देवताओ ने अभी क्षीरसागर का मथना प्रारम्भ किया है। वहाँ से इसके बदले में अमृत लाकर हमें दो तब अपनी माता को स्वीकार करो क्योंकि तुम अत्यन्त बलवान् हो ॥१९६-१९७॥ नागों के यह वचन सुनकर और अमृत के लिए क्षीर समुद्र पर जाकर गरुड़ ने अत्यन्त पौरुष प्रकट किया ॥१९८॥ गरुड़ के पराक्रम से प्रसन्न होकर भगवान् विष्णु ने स्वयं गरुड़ से कहा कि मैं तुमपर प्रसन्न हूँ अतः कुछ वर मांगो ॥१९९॥ माता के दास्य के अपमान से क्रुद्ध गरुड़ ने भगवान् से वर मांगा कि नाग मेरे भक्ष्य हों ॥२००॥ भगवान् ने 'ऐसा ही हो'—कहकर उसे वही वरदान दिया। तदनन्तर गरुड़ अपने पराक्रम से अमृत को प्राप्त कर जब चलने लगा तब देवराज इन्द्र ने उससे कहा—॥२०१॥ 'हे पक्षिराज तुम्हें ऐसा करना चाहिए कि जिससे ये धूर्त सर्प अमृत को न खा सकें। अतः मैं इसे सर्पों से हरण कर लूँगा ॥२०२॥ ऐसा सुनकर विष्णु के वर से प्रसन्न गरुड़ ने इन्द्र के इस प्रस्ताव को स्वीकार किया और अमृत-कलश लेकर सर्पों के समीप गया ॥२०३॥