कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
DevanagariHindipublished876 पृष्ठ
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प्रथम लम्बक १७ इसलिए, हे भद्र ! तुम जन्म से लेकर आजतक का अपना समस्त वृतान्त यदि मुझ-जैसे व्यक्ति से गोपनीय न हो तो कहो और मुझे पुनः पवित्र करो ॥२८॥ इसके अनन्तर नम्रतापूर्वक अनुरोध करते हुए काणभूति से वररुचि ने विस्तारपूर्वक अपना वृतान्त कहना प्रारम्भ किया ॥२९॥ वररुचि की जन्म-कथा कौशाम्बी नगरी में सोमदत्त नाम का एक ब्राह्मण था। उसे अग्निदत्त भी कहते थे। उसकी पत्नी का नाम वसुदत्ता था॥३० ॥ वसुदत्ता पूर्वजन्म में मुनि कन्या थी जो शाप के कारण मानव जाति में उत्पन्न हुई थी। उसी वसुदत्ता के गर्भ से मेरी उत्पत्ति हुई॥३१॥ मेरे शैशव में ही मेरे पिता परलोकवासी हो गये। अतः मेरी माता ने बड़े ही कष्टों के साथ मेरा पालन-पोषण किया॥३२॥ एक बार हमारे घर में लम्बे मार्ग-श्रम से श्रान्त दो ब्राह्मण एक रात निवास के लिए आये ॥३३॥ उनके हमारे यहाँ रहते हुए एक बार मृदंग की ध्वनि हुई। वह सुनकर मेरी माता अपने पति का स्मरण करके गद्गद स्वर में बोली ॥३४॥ 'बेटा ! तुम्हारे पिता का मित्र नन्द नाम का नट नाच रहा है। मैंने भी कहा 'माता ! मैं उसका नाच देखने जाता हूँ। ॥३५॥ मैं उसका नाच देखकर उसके अक्षरशः कथोपकथन के साथ अभिनय करते हुए तुम्हें भी दिखाऊँगा। मेरी यह बात सुनकर वे दोनों ब्राह्मण अति आश्चर्य्यान्वित हुए॥३६॥ उन्हें चकित देखकर मेरी माता बोली—'हे पुत्रो ! यह बालक एक बार जो कुछ सुन लेता है, उसे हृदय में धारण कर लेता है, इसमें कोई संशय नहीं' ॥३७॥ उन्होंने मेरी परीक्षा के लिए प्रातिशाख्य१ (वैदिक व्याकरण) पढ़ाया और मैंने उनके सामने ही उसे यथावत् सुना दिया॥३८॥ इसके अनन्तर मैंने उन दोनों के साथ जाकर नन्द नट का नाच देखा और घर आकर माता के सामने सम्पूर्ण नाटक वैसा ही दिखा दिया जैसा देखा था॥३९॥ एक बार सुनकर स्मरण रखनेवाला मुझे जानकर उन दोनों अतिथियों में एक व्याडि२ नामक ब्राह्मण मेरी माता को प्रणाम करके बोला ॥४० ॥
१ वैदिक व्याकरण का एक ग्रन्थ जिसमें उच्चारण-सम्बन्धी वैदिक व्याकरण के नियम लिखे हैं। २ व्याडि ने व्याकरण-शास्त्र पर संग्रह नामक महाग्रन्थ लिखा है। इसका विवेचन, परिशिष्ट प्रकरण में देखिए।—अनु ३