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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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चतुर्थ लम्बक ४५७ और वर के प्रभाव से डरे हुए नागों से बोला कि 'मैंने अमृत ला दिया है। मेरी माता को दासता से मुक्त करके इसे लो' ॥१९४॥ यदि तुम्हें मुझसे भय है तो मैं इसे कुशा के आसन पर रख देता हूँ और अपनी माता को छुड़ा ले जाता हूँ। तुम लोग इसे स्वीकार करो' ॥१९५॥ 'ऐसा ही करो' नागों के इस प्रकार कहने पर पवित्र कुशासन पर अमृत-कलश को रखवा- कर नागों ने गरुड़ की माता विनता को छोड़ दिया ॥१९६॥ माता को दासता से मुक्त कराकर गरुड़ के चले जाने पर नाग निर्भयतापूर्वक जब अमृतपान करने के लिए एकत्र हुए, तब इन्द्र ने अपनी शक्ति से कुशासन पर रखे हुए सुधा-कलश का अपहरण कर लिया ॥१९७-१९८॥ हताश नागों ने 'कहीं अमृत गिरकर कुशा में न लगा हो'—ऐसा मानकर कुशाग्रों को चाटना प्रारम्भ किया ॥१९९॥ कुशाग्रों को चाटने से उनकी जीभों के दो टुकड़े हो गये । सच है, अत्यन्त लोभियों को हँसी के सिवा और क्या फल मिलता है ॥२००॥ अमृत के स्वाद से वञ्चित नागों का शत्रु गरुड़ विष्णु के वरदान के कारण बार-बार नागों पर टूटकर उन्हें खाने लगा ॥२०१॥ फलतः गरुड़ के आक्रमण से सारा पाताल व्याकुल हो गया। भय के कारण सर्प निर्जीव से हो गये। गर्भिणी नागपत्नियों के गर्भपात होने लगे और इसी भय मात्र से अनेक नाग प्राणों से भी हाथ धो बैठे ॥२०२॥ नागों के लिए जीमूतवाहन का आत्मसमर्पण प्रतिदिन इस प्रकार का आतङ्क देखकर नागराज वासुकि ने सोचा कि इस प्रकार तो सारा नागलोक सहसा नष्ट हो जायगा और गरुड़ भी अजेय है। ऐसा सोचकर उसने गरुड़ के साथ मिलकर एक नियम बना लिया कि प्रतिदिन एक नाग समुद्र-तट के पर्वत पर गरुड़ के भोजन के लिए भेज दिया जायगा। तब नागराज ने गरुड़ से कहा कि 'तुम पाताल में उपद्रव करने का आतङ्क फैलाने न आया करो। अन्यथा इस प्रकार एक साथ ही समस्त नागों के नाश हो जाने पर तुम्हारा स्वार्थ नष्ट ही जायगा' ॥२०३-२०५॥ गरुड़ ने भी इस व्यवस्था को मान लिया और वासुकि द्वारा भेजे हुए एक-एक नाग को वह प्रतिदिन खाने लगा ॥२०६॥ १ सर्प इसीलिए 'द्विजिव्ह' या दो जिह्वा वाले कहे जाते हैं। ५८