कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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Read in contextचतुर्थ लम्बक ४६५ जीमूतवाहन के कहने पर शंखचूड़ भी रसातल को गया और जीमूतवाहन का यश तीनों लोकों में फैल गया॥ २५३॥ तदनन्तर प्रेम से नम्र देवताओं के समूह गरुड़ के पास आकर उस विद्याधर-कुल के तिलक जीमूतवाहन को प्रणाम करने लगे। पार्वती की कृपा से मतंग नामक जीमूतवाहन के सम्बन्धी भी भय से जाकर उसे प्रणाम करने लगे जो पहले उसके विरुद्ध थे॥ २५४॥ उन्हीं पूर्वविरोधी बन्धुओं से प्रार्थना किया गया जीमूतवाहन अपनी पत्नी मलयवती और प्रियमित्र मित्रावसु के साथ मलयाचल से हिमाचल पर अपनी प्राचीन राजधानी को गया॥२५५॥ इस प्रकार उस धैर्यशाली जीमूतवाहन ने चिरकाल तक विद्याधर-चक्रवर्ती पद का उपभोग किया ॥२५६॥ अपने इस उज्ज्वल चरित्र से तीनों लोकों के हृदयों को चमत्कृत करनेवाले महापुरुषों की कल्याण-परम्परा स्वयं उनके समीप आती है ॥२५७॥ महारानी वासवदत्ता यौगन्धरायण के मुख से इस अद्भुत कथा को सुनकर अत्यन्त प्रसन्न हुई ॥२५८॥ तदनन्तर प्रसन्न देवताओं के निरन्तर आवेश प्राप्त होते रहने के कारण इसी प्रसंग की चर्चा करती हुई अपने पति के निकट बैठी वासवदत्ता ने विद्याधरों के भावी चक्रवर्ती अपने पुत्र की कथा में वह दिन व्यतीत किया ॥ २५९॥ नरवाहनदत्तजनन नामक चतुर्थ लम्बक का दूसरा तरंग समाप्त तृतीय तरंग वासवदत्ता का स्वप्न कुछ समय के अनन्तर एक दिन वासवदत्ता मन्त्रियों के साथ बैठे हुए वत्सराज से एकान्त में इस प्रकार कहने लगी—॥१॥ 'हे आर्यपुत्र ! जबसे मैंने इस गर्भ को धारण किया है, तब से मुझे इसकी रक्षा के लिए हृदय में अत्यधिक व्याकुलता बढ़ रही है ॥२॥ इसी प्रकार की चिन्ता करती हुई मैं आज रात किसी प्रकार सोई। नींद आने पर मैंने स्वप्न में एक पुरुष को देखा ॥३॥ ५९