कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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Read in contextचतुर्थ लम्बक ४७७ वाद्यों के शब्द घरों से निकलकर आकाश में फैलने लगे मानों समस्त विद्याधरों को नवीन राजा के जन्म लेने की सूचना दे रहे हों॥७७॥ ऊँचे-ऊँचे महलों पर फहराती हुई सात रंग की पताकाएँ मानां प्रसन्नता से आपस में गुलाल उड़ा रही हों—ऐसी प्रतीत होती थी॥७८॥ घर-घर में प्रसन्नता से वेश्याओं के नाच-गान चल रहे थे। ऐसा लगता था मानों स्वर्ग की सुन्दरियाँ प्रसन्नता से भूमि पर उतर आई हों॥७९॥ उत्सव के उपलक्ष में राजा द्वारा बाँटे गये एक समान वस्त्रों और आभूषणों से सारी नगरी एक समान वैभवशाली मालूम होती थी॥८०॥ जब राजा ने उत्सव के उपलक्ष में अपने सेवकों को धन लुटाना प्रारंभ किया तब खजाने के अतिरिक्त और कोई भी खाली न रहा॥८१॥ पुरुष ही नहीं स्त्रियाँ भी मंगलगान करती हुई रीति-रिवाजों को जाननेवाली नाचती गाती और विविध प्रकार के उपहार हाथों में ली हुई अपने लड़कों के साथ-साथ रनिवास में एकत्र हुईं, तो ऐसा लगता था मानों स्वर्ग की स्त्रियाँ प्रसन्नता से राजभवन में उतर आई हों॥८२-८३॥ उस समय सभी की चेष्टाएँ नृत्यमयी सभी के वचन पूर्णपात्रमय सभी का व्यवहार त्यागमय और सभी का स्वर वाद्यमय हो रहा था॥८४॥ आनन्दमयी उस नगरी में सभी जन अबीर-गुलालमय और सारी भूमि रुचियों से भरी हुई थी॥८५॥ इस प्रकार अनेक दिनों तक चलता हुआ यह उत्सव नागरिकों के मनोरथ के समान पूर्ण हुआ॥८६॥ आकाशवाणी के आज्ञानुसार पिता द्वारा दिये गये नरवाहनदत्त नामवाला वह राजकुमार कुछ दिनों में ही प्रतिपदा के चन्द्रमा के समान क्रमशः बड़ा हुआ॥८७॥ चमकते चिकने और सुन्दर गलों की कान्तिवाले दो-चार निकलते हुए आगे के सुन्दर दाँतों- वाले उस राजकुमार के मुँह से निकलते हुए कुछ अस्पष्ट और तुतले बोलों तथा लीलापूर्वक दो-चार डग भरने की उसकी चालों को देखकर उसका पिता मन ही मन अत्यन्त प्रसन्नता अनुभव करता था॥८८॥ इस प्रकार, उसके कुछ बड़े होने पर सभी मन्त्रियों ने हृदयों को आनन्द देनेवाले अपने- अपने बालकों को सादर खेलने के लिए राजकुमार को सौंप दिया॥८९॥