कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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Read in contextपंचम लम्बक ४८९ 'यह कन्या कनकरेखा विवाह की चिन्ता के साथ समान रूप से बढ़ती हुई मेरे हृदय को व्यथित कर रही है॥२४॥ समुचित स्थान से भ्रष्ट गीति (गान) के समान कन्या पराये व्यक्ति के भी कानों में उद्वेग उत्पन्न करती है॥२५॥ अज्ञान से कुपात्र में दी हुई विद्या के समान कुपात्र को दी हुई कन्या न यश के लिए होती है, न धर्म के लिए ही प्रत्युत पश्चात्ताप के लिए होती है॥२६॥ अतः मैं इस कन्या को किस राजा के लिए दूँ। इसके योग्य वर कौन होगा यह मेरे हृदय में भारी चिन्ता हो रही है' ॥२७॥ यह सुनकर महारानी कनकप्रभा हँसकर राजा से बोली कि 'आप तो इस प्रकार चिन्तित हैं किन्तु वह कनकरेखा तो विवाह ही नहीं करना चाहती' ॥२८॥ 'आज ही खेल में गुड़िया बनाती हुई उससे मैंने कहा कि 'मैं तुम्हारा विवाह कब देखूँगी' ॥२९॥ मेरे ऐसा प्रश्न करते ही उसने रोष के साथ मुझसे कहा 'माँ ऐसा मत कहो ऐसा मत कहो मुझे किसी के लिए भी न दो॥३०॥ तुम्हारे साथ मेरा वियोग न होगा। मैं अविवाहित ही ठीक हूँ। यदि तुमने मेरा विवाह किया तो मुझे मरी ही समझो। इसमें कुछ कारण है'॥३१॥ यह सुनकर व्याकुल मैं तुम्हारे पास आई हूँ। विवाह न करनेवाली कन्या के लिए वर का शोधना ही व्यर्थ है॥३२॥ रानी के मुख से ऐसा सुनकर घबराया हुआ राजा कन्या के भवन में जाकर उससे बोला—'बेटी जिस पति की प्राप्ति के लिए देवताओं और दैत्यों की कन्याएँ तपस्या करके भगवान् से प्रार्थना करती हैं उसे तू ने मना कर दिया ॥३३ ३४॥ पिता की बातें सुनकर भूमि पर दृष्टि गड़ाए हुई राजकुमारी कनकरेखा बोली—॥३५॥ 'पिताजी मुझे विवाह की चाह नहीं है तो इसमें आपको इतना आग्रह क्यों है ? ॥३६॥ पुत्री के इस प्रकार कहने पर बुद्धिमान् और परोपकारी राजा इस तरह कहने लगा—बेटी कन्यादान के बिना गृहस्थ की फलप्राप्ति के लिए दूसरा कौनसा उपाय है ? ॥३७॥