भारतकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

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पंचम लम्बक ४९१ राजा ने भी उसकी सत्यता जाँचने के लिए उसे राजकुमारी के पास भेज दिया ॥६६॥ राजकन्या ने द्वारपाल से समाचार सुनकर पास आये हुए उस ब्राह्मण से पूछा 'क्या तुमने कनकपुरी देखी है ? ॥६७॥ उसने स्वीकार करते हुए कहा कि विद्यार्थी-अवस्था में घूमते हुए उस नगरी को मैंने देखा था॥६८॥ 'किस प्रकार तुम वहाँ गये थे और वह कैसी नगरी है? राजकुमारी के पुनः इस प्रकार पूछने पर उस ब्राह्मण ने इस प्रकार कहा॥६९॥ यहाँ से मैं हरपुर नामक नगर में गया और वहाँ से चलकर क्रमशः वाराणसी पहुँचा ॥७०॥ वाराणसी से चलकर मैं पौण्ड्रवर्धन नामक नगर में पहुँचा और उसके पश्चात् मैं उस कनकपुरी नगरी में पहुँचा ॥७१॥ पुण्यात्माओं के लिए इन्द्रपुरी के समान वह भोगभूमि है। उसकी शोभा अपलक नेत्रों से देखने योग्य है॥७२॥ वहाँ विद्या प्राप्त कर कुछ समय पश्चात् मैं यहाँ आ गया ! इस प्रकार इस मार्ग से मैं गया और वह ऐसी नगरी है' ॥७३॥ उस धूर्त ब्राह्मण शक्तिदेव की इस प्रकार की बनावटी बातों को सुनकर राजकन्या मुस्कराती हुई बोली—'हे ब्राह्मण ! यह सत्य है कि तुमने वह नगरी देखी। किन्तु यह तो बताओ कि तुम उस नगरी में किस मार्ग से गये थे फिर से एक बार बताओ' ॥७४-७५॥ राजकुमारी के इस प्रकार पूछने पर जब शक्तिदेव पुनः धृष्टता करने पर उतारू हुआ तब राजकुमारी ने दासियों से कहकर उसे बाहर निकलवा दिया ॥७६॥ उसके निकल जाने पर राजपुत्री पिता के पास गई। पिता ने उससे पूछा कि 'वह ब्राह्मण सत्य कहता था अथवा नहीं ॥७७॥ तब वह राजपुत्री कहने लगी—'पिताजी आप राजा होकर भी ऐसी अविवेकपूर्ण बातें क्यों करते हैं? क्या आप नहीं जानते कि धूर्त जन सरल व्यक्तियों को ठग लेते हैं। यह ब्राह्मण झूठ बोलकर मुझे ठग लिया चाहता था। इस धूर्त ने कनकपुरी नहीं देखी है। धूर्त लोग अनेक प्रकार की ठगियाँ किया करते हैं॥७८-८०॥