भारतकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

पृष्ठ 544, कुल 876 में से

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पंचम लम्बक ४९७ शिव के इस प्रकार अपना प्रभाव जमा लेने पर उसके दूसरे साथी माधव ने अपने गुप्तचरों से जानकर नगरी में प्रवेश किया ॥१०६॥ और शिव के स्थान से दूर एक मन्दिर में अपना निवास स्थिर किया। एक बार माधव राजपुत्र के नकली वेष में स्नान करने के लिए क्षिप्रा नदी के तट पर गया ॥१०७॥ स्नान करने के पश्चात् वह देव-मन्दिर में जप करते हुए शिव को देखकर अत्यन्त भक्ति- भाव से नम्र होकर उसके चरणों में गिर पड़ा ॥१०८॥ और जनता के सामने कहने लगा कि ऐसा दूसरा तपस्वी इस समय नहीं है। मैंने तीर्थों में भ्रमण करते हुए इस बात का बार-बार अनुभव किया है ॥१०९॥ शिव भी दम्भ से गर्दन टेढ़ी करके उसे देखता हुआ मौन ही रहा और माधव प्रणाम करके घर चला गया ॥११०॥ फिर रात में मिलकर और खा-पीकर उन दोनों ने अपने आगे के कर्त्तव्य की योजना बनाई। कुछ रात्रि शेष रहते ही शिव अपने मठ में लौट आया और माधव ने भी प्रातःकाल अपने साथियों में से एक धूर्त को आदेश दिया ॥१११-११२॥ कि ये दो वस्त्र (पागी और दुपट्टा) लेकर राजपुरोहित शंकरस्वामी के घर जाओ और उससे कहो कि अपने बन्धु-बान्धवों के द्वारा सताया गया माधव नामक राजकुमार दक्षिण देश से कुछ राजपुत्रों के साथ बहुत-सा धन लेकर यहाँ आया है। वह आपके राजा की सेवा करेगा ॥११३-११५॥ 'उसने आपके दर्शन के लिए (समय माँगने के लिए) मुझे आपके पास भेजा है' इस प्रकार नम्रता के साथ राजपुरोहितजी से कहना ॥११६॥ माधव द्वारा इस प्रकार कहा गया वह धूर्त हाथ में भेंट लिये उसने माधव का सन्देश उसे सुनाया ॥११७-११८॥ राजपुरोहित ने भी भविष्य में लाभ की कल्पना और वर्तमान में भेंट के लोभ में फँसकर उसकी बात मान ली। सच है लोभियों के लिए भेंट, उपहार आदि एकमात्र आकर्षणकारी औषधि हैं ॥११९॥ ६३

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