कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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Read in contextपंचम लम्बक ४९९ उस धूर्त के लौट आने पर दूसरे दिन वह माधव मौका देखकर स्वयं पुरोहित से मिलने के लिए गया ॥१२० ॥ नकली राजपुत्र बना हुआ पथिक का वेष धारण किये हुए और अपने सभी धूर्त्तों के साथ लाठी आदि लिये हुए सेवकों से युक्त वह माधव पहले से ही अपने आगमन की सूचना देकर, राजपुरोहित से मिला ॥१२१॥ पुरोहित ने भी अगवानी के लिए आगे जाकर प्रसन्नता प्रकट करते हुए उसका स्वागत और अभिनन्दन किया ॥१२२॥ माधव कुछ समय तक उसके साथ बैठकर और इधर-उधर की बातें करके तत्पश्चात् राजपुरोहित से आज्ञा लेकर अपने घर लौट आया ॥१२३॥ दूसरे दिन फिर से एक भेंट (उपहार) भेजकर माधव पुरोहित के पास गया और बोला कि हम अपने कुटुम्ब के भरण-पोषण के लिए सेवावृत्ति (नौकरी) करना चाहते हैं इसीलिए आपकी सेवा में उपस्थित हुए हैं। वैसे तो हमारे पास धन की कुछ मात्रा है ॥१२४-१२५॥ यह सुनकर उस पुरोहित ने उससे कुछ (घूस) प्राप्ति की आशा से माधव की इच्छा पूर्ति करना अर्थात् नौकरी दिलाना स्वीकार किया ॥१२६॥ और तुरन्त राजा के पास माधव को ले जाकर, उसके प्रशंसनीय परिचय का बयान करते हुए गौरव के साथ उसे राजा से मिला दिया ॥१२७-१२८॥ राजा ने भी राजकुमार के समान आकृतिवाले माधव को देखकर आदर के साथ उस पर कृपा की और उसे नौकरी पर नियुक्त करा दिया ॥१२९॥ इस प्रकार माधव दिन में राजसेवा में लगा रहता था और रात में मित्र से मिलकर ठगी की योजना बनाया करता था ॥१३० ॥ कुछ दिनों के उपरान्त लोभी पुरोहित ने माधव से कहा कि 'तुम यहीं मेरे घर पर ही रहा करो' ॥१३१॥ पुरोहित के आग्रह करने पर उसके ही माल का अपहरण माधव अपने धूर्त मित्रों के साथ उसके घर पर उसी प्रकार रहने लगा जैसे 'मद्गु' नामक जन्तु (पक्षी) वृक्ष पर रहा करता है। माधव ने नकली माणिक के कुछ गहने बनवाकर एक पेटी में बन्द किये और उस पेटी को उसने पुरोहित के खजाने में रखवा दिया ॥१३२ १३३॥