कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपंचम लम्बक ५०९ इसने अपने इच्छानुसार ही उसका मूल्य देकर वह मुझसे खरीद किया। इस विषय में हम दोनों के क्रय-विक्रय-सम्बन्धी लिखित प्रमाण भी सुरक्षित हैं॥१९१॥ अब क्या करना चाहिए, यह आप स्वयं जानते हैं। ऐसा कहकर शिव के चुप हो जाने पर पुरोहित से माधव कहने लगा—'ऐसा न कहो। मेरा इसमें क्या अपराध है। न मैंने तुम्हारा कुछ लिया है और न शिव का॥१९१ १ २॥ यह मेरा पैतृक धन यहीं अमानत में रखा था। मैंने उसे लाकर पुरोहित को दे दिया। और पुनः उसी के नाम पर मैंने ब्राह्मण को दान दे दिया। यदि यह आपकी मातृगण नहीं है तो मुझे सीसा और पीतल के दान देने का क्या फल होगा॥१ ९४॥ मैंने निष्कपट भाव से दान दिया और परिणामस्वरुप तत्काल ही भीषण रोग से छुटकारा भी पा गया। इसलिए मुझे तो अपने दान पर पूरा विश्वास है'॥१९५॥ इस प्रकार अपनी मुखमुद्रा को बिना किसी रूप में विकृत किये स्वाभाविक रूप से माधव के कहने पर मंत्रियों के साथ राजा हँसने लगा॥१९६॥ तब सभी सभासदों ने मन ही मन मुस्काते हुए कहा कि 'इसमें माधव या शिव का कोई अपराध नहीं है। सच है, अत्यन्त लोभ से अन्धा हो जाना किसके लिए विपत्ति का कारण नहीं होता है॥१९७॥ तदनन्तर वह पुरोहित अपना धन गंवाकर राज-दरबार से भी हँसी का पात्र बनकर अत्यन्त लज्जित होकर अपने घर आ गया॥१९८॥ वे दोनों धूर्त शिव और माधव प्रसन्न राजा की कृपा से आनन्द लेते हुए उसी उज्जयिनी में आनन्दपूर्वक रहने लगे॥१९९॥ इस प्रकार इस कथा को सुनाकर राजकुमारी ने अपने पिता से कहा कि 'इसी प्रकार इस पृथ्वी पर आग (दाव) से जीनेवाले धूर्त अपनी जिह्वा के जाल बुनते रहते हैं जिसमें सरल- हृदय मनुष्य मछलियों के समान फँसते रहते हैं॥२००॥ इसी प्रकार 'मैंने कनकपुरी देखी है'—ऐसा कहकर यह धूर्त ब्राह्मण मुझे ठगकर मुझ और युवराज-पद को प्राप्त करना चाहता है॥२०१॥ इसलिए मेरे विवाह के लिए तुम्हें शीघ्रता न करनी चाहिए। अभी मैं कुमारी अवस्था में ही हूँ। देखती हूँ क्या होता है ॥२०२॥ कन्या कनकप्रभा के इस प्रकार कहने पर राजा सोच-विचार करने लगा—'बेटी! युवावस्था में अधिक समय तक कन्या बना रहना उचित नहीं है। गुप्त में दाह करनेवाले मत्सरी व्यक्ति मिथ्या कलंक लगा देते हैं॥२ १२ ४॥