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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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पंचम लम्बक ५२१ पुत्र के ऐसा कहने पर पिता गोविन्दस्वामी ने कहा—'बेटा ! वह तो श्मशान है और वह चिता जल रही है। पिशाच भूत प्रेत आदि से युक्त भीषण श्मशान में तुम्हें कैसे ले जाऊँ ? तुम अभी बच्चे हो।' इस प्रकार पिता के वचन सुनकर वीर बालक विजयदत्त पिता को फटकारते हुए बोला—'पिताजी ये बेचारे पिशाच आदि मेरा क्या कर लेंगे ? क्या मैं दुर्बल हूँ ? तुम बिना किसी शंका के मुझे वहीं ले चलो' ॥११९ १८॥ आग्रहपूर्वक इस प्रकार कहते हुए पुत्र को पिता वहाँ ले गया और वह बालक भी शरीर को तपाता हुआ चिता के पास जा पहुँचा ॥११९॥ जलती हुई आग की लपटों के केशोंवाली और नर-मांस को ग्रहण करनेवाली वह चिता मानों राक्षसों की गृहदेवी थी॥१२०॥ कुछ देर तक शरीर तपाने से सावधान होकर बालक ने पिता से पूछा—'चिता के अन्दर यह बोला-सा क्या बोलता है ? ॥१२१॥ पास बैठे हुए पिता ने कहा—'बेटा ! यह मनुष्य का कपाल (सिर) जल रहा है' ॥१२२॥ तब उस लड़के ने ग्राह के समान जलती हुई चिता की लकड़ी से उस सिर को फोड़ दिया॥१२३॥ सिर को फोड़ते ही उससे निकलती हुई चर्बी की धारा उस बालक के मुँह में आ गिरी। मानों श्मशान की आग ने उसे राक्षसी सिद्धि प्रदान की हो॥१२४॥ उस चर्बी के चखन से वह बालक राक्षस बन गया। उसके सिर के बाल खड़े हो गये। विकट दाँत निकल आये और उसने तलवार तान ली॥१२५॥ तदनन्तर लकड़ी से उस कपाल को खींचकर वह बालक उसकी सारी चर्बी को आग के समान लपलपाती जीभ से चटपट चाट गया ॥१२६॥ तब वह कपाल को फेंककर और तलवार खींचकर अपने पिता गोविन्दस्वामी को ही मारने के लिए उसके पीछे दौड़ा॥१२७॥ इतने में ही श्मशान से आवाज आयी कि 'हे करालास्फोट देव ! अपने पिता को मत मारो। इधर आओ' ॥१२८॥ यह सुनकर करालास्फोट भय प्राप्त करके वह बालक पिता को छोड़कर राक्षस बनकर अन्तर्धान हो गया ॥१२९॥ ६७