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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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[Page Header] पंचम लम्बक ५३३

वह दक्षिणी मल्ल भी हाथ से भुजाओं पर ताल ठोंकता हुआ अखाड़े में आया। यशोवरदत्त ने उस मल्ल (पहलवान) का हाथ मरोड़कर उसे पटक दिया ॥ १२४॥ तब उस पहलवान के पटके जाने पर उठे हुए कलरव से मानों अखाड़े की भूमि उस यशोवरदत्त को धन्यवाद देने लगी॥ १२५॥ काशिराज प्रतापमुकुट ने प्रसन्न होकर पुरस्कार में यशोवरदत्त को रत्नों से भर दिया ॥ १२६॥ साथ ही उसके पराक्रम से प्रसन्न होकर उसे अपना अंग रक्षक नियुक्त कर लिया। फलतः वह यशोवरदत्त कुछ ही दिनों में राजा से बहुत सम्पत्ति प्राप्त कर धनी हो गया। राजा भी शस्त्रविद्या का विशेषज्ञ था ॥ १२७॥ एक बार वह राजा चतुर्दशी तिथि को नगर के बाहर स्थापित किये गये शिवजी के दर्शन के लिए गया। उनकी पूजा करके वह रात में श्मशान-मार्ग से ही लौटा। आते हुए उसने श्मशान से निकली हुई यह वाणी सुनी कि 'हे स्वामी! मुझे दण्डाधिकारी ने झूठ ही प्राणदण्ड की सजा देकर शूली पर चढ़वा दिया है। आज तीसरा दिन है। मुझे पापी के प्राण नहीं निकल रहे हैं। मैं अत्यन्त प्यासा हूँ। मुझे पानी पिलाओ' ॥ १२८-१३१॥ यह सुनकर राजा ने दया करके अपने साथ चल रहे यशोवरदत्त से कहा कि 'तुम इसे जल सेवो' ॥ १३२॥ उसने कहा—महाराज इस समय रात को श्मशान में कौन जायगा इसलिए मैं स्वयं ही जाता हूँ'— ऐसा कहकर यशोवरदत्त पानी लेकर स्वयं ही वहाँ गया ॥ १३३॥ राजा के अपनी नगरी में चले जाने पर वह वीर यशोवरदत्त चारों ओर घने अँधेरे से भरे हुए, शृगालों द्वारा इधर-उधर फेंके गये मांस के टुकड़ों से मानों बलि दिये गये चिताओं की चमक से कहीं-कहीं प्रकाशमान नाचते हुए वेतालों से शब्दायमान और काली रात के निवास-भवन के समान उस श्मशान में उसने प्रवेश किया॥ १३४-१३६॥ वहाँ जाकर उसने ऊँचे स्वर में कहा— 'राजा से किसने पानी माँगा है ?' तब उसने एक ओर से 'मैंने माँगा है' इस प्रकार का शब्द सुना ॥ १३७॥ उसी शब्द के अनुसार उसने चिता की आग देखी और वहीं शूली से बिंधे हुए किसी पुरुष को देखा ॥१३८॥

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