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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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पंचम लम्बक ५६३ उत्तर में वे बोलीं—'यह कनकपुरी नाम की नगरी विद्याधरों का स्थान है। यहाँ चन्द्र- प्रभा नाम की विद्याधरी है। हमें उसी की उद्यानपालिका (मालिन) समझो। यह पुष्प हम उसी के लिए चुन रही हैं' ॥४०-४१॥ तब वह ब्राह्मण कहने लगा कि 'तुमलोग ऐसा यत्न करो कि जिससे मैं तुम्हारी स्वामिनी को देख सकूँ' ॥४२॥ ऐसा सुनकर और उसे स्वीकार कर वे दोनों उस युवक को नगरी के अन्दर स्थित राजभवन में ले गईं ॥४३॥ राजभवन में जाकर उसने मणिमय के स्तम्भों और सोने की दीवारों से चमकते हुए लक्ष्मी के भवन के समान उस भवन को सम्पत्तियों का निवास-स्थान समझा ॥४४॥ भवन में आये हुए उसे देखकर चन्द्रप्रभा की सभी सेविकाओं ने जाकर अपनी स्वामिनी से मनुष्य के आश्चर्यमय आगमन की सूचना दी ॥४५॥ चन्द्रप्रभा ने भी अपने प्रतीहार को आज्ञा देकर शीघ्र ही उसे भवन के भीतर अपने निकट बुला लिया ॥४६॥ अन्दर आये हुए उस शक्तिदेव ने आँखों को आनन्द-देनेवाली और विधाता के आश्चर्यमय निर्माण की मूर्त्तिमती सीमा के समान उस चन्द्रप्रभा को देखा ॥४७॥ वह चन्द्रप्रभा उसे देखकर सुन्दर रत्नों के पलँग से उठकर उसका स्वागत करने के लिए आदर के साथ आगे बढ़ी ॥४८॥ शक्तिदेव के प्रथम दर्शन-मात्र से ही उसके वश में हुई चन्द्रप्रभा उसके बैठन पर कहने लगी—हे कल्याणमय ! मनुष्यों के लिए अगम्य इस भूमि में तुम कैसे आ गये ? चन्द्रप्रभा द्वारा उत्सुकता से इस प्रकार पूछे जाने पर शक्तिदेव ने अपना देश, अपनी जाति और नाम बताकर यह बताया कि कनकपुरी देखने की प्रतिज्ञा पर राजकुमारी कनकरेखा को प्राप्त करने के लिए यहाँ आया हूँ। इस प्रसंग का समस्त वृत्तान्त उसने चन्द्रप्रभा को सुना दिया ॥४९-५१॥ यह सब सुनकर, कुछ सोचकर तथा लम्बी साँस लेकर चन्द्रप्रभा ने एकान्त में शक्तिदेव से कहा—सुनो, मैं तुमसे यह कहती हूँ। इस भूमि पर शशिखण्ड नाम का विद्याधर राज्य करता है। उसकी क्रमशः हम चार कन्याएँ हैं। सबसे बड़ी चन्द्रप्रभा मैं हूँ दूसरी चन्द्ररेखा है ॥५२-५४॥