कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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Read in contextकुछ समय पश्चात् चतुर्दशी के आने पर चन्द्रप्रभा शक्तिदेव से कहने लगी—'आज मैं तुम्हारे लिए पिता से निवेदन करने जाती हूँ, मेरे सभी सेवक मेरे साथ ही जायेंगे। इन दो दिनों तक तुम अकेले दुःखी न होना ॥७०-७१॥ इस भवन में अकेले रहते हुए भी तुम बीच की मञ्जिल में कभी न जाना' ॥७२॥ उस युवक को ऐसा कहकर और उसी में अपने हृदय को रखकर तथा इसी प्रकार उसके हृदय को चन्द्रप्रभा अपने साथ लेकर वहाँ से चली गई ॥७३॥ वह शक्तिदेव अब वहाँ अकेला रहता हुआ मन बहलाने के लिए, इधर-उधर अत्यन्त समृद्धि-सम्पन्न उन मकानों में घूमता रहता था ॥७४॥ 'उस विद्याधर-कन्या ने मेरा ऊपर (बीच की मञ्जिल में) जाना क्यो वारित किया' इस प्रकार के कुतूहल से वह उसी मञ्जिल में पहुँचा। मनुष्यों के मन की प्रवृत्ति प्रायः निषेध के विपरीत ही चलती है ॥७५॥ ऊपर चढ़कर उसने मूर्त रूप से सुरचित तीन मंडपों को देखा ॥७६॥ उसमें प्रविष्ट होकर उसने सुन्दर बिछावनों से युक्त रत्नों के पलंग पर दुपट्टा ओढ़ने से ढंके हुए शरीर से शयन करते हुए किसी व्यक्ति को देखा ॥७७-७८॥ जब उसने कपड़ा उठाकर उसे देखा तब तो उसे परोपकारी राजा की मरी हुई कन्या कनक-रेखा दिखाई पड़ी ॥७९॥ उसे देखकर शक्तिदेव सोचने लगा—'यह क्या महान् आश्चर्य है? क्या यह अचेतनावस्था (बेहोशी) में सोई है या मुझ ही भ्रम हो रहा है ॥८०॥ जिसके लिए मेरी इतनी लम्बी और कष्टप्रद यात्रा हुई वह निर्जीव होकर यहाँ पड़ी है और वहाँ (वर्धमान में) जीवित है ॥८१॥ इसकी मुखकान्ति भी मलिन नहीं पड़ी है। प्रतीत होता है कि विधाता ने किसी कारण वश मेरे लिए असमय ही यह इन्द्रजाल रचा है ॥८२॥ ऐसा सोचते-सोचते उसने दूसरे दोनों मंडपों के अन्दर क्रमशः जाकर उसी प्रकार सोई हुई और दो कन्याएँ देखीं ॥८३॥ उन मंडपों से निकलकर आश्चर्यचकित शक्तिदेव ने ऊपर बैठ हुए वहीं से नीचे एक अत्यन्त सुन्दर बावली देखी और उसके किनारे पर रत्नों की जीनवाले एक सुन्दर घोड़े को देखा ॥८४॥
१. 'अरेबियन नाइट्स' में तीन राजपोतों की कहानी में ऐसी राजकन्याओं की चर्चा है और इसी प्रकार एक मंजिल देखने की मनाही है। वहाँ ऐसे ही एक घोड़े का वर्णन भी है।—अनु.