कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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Read in contextषष्ठ लम्बक ६१३ उसने एक महावीर पुत्र की प्राप्ति के लिए अग्नि-देवता की आराधना की। उसी वेदविद्या- विशारद ब्राह्मण का मैं पुत्र उत्पन्न हुआ ॥१६४॥ पत्नी के साथ मेरे पिता के स्वर्ग चले जाने पर शिशु-काल में ही मैंने विद्याध्ययन तो किया किन्तु अनाथ होने के कारण अपना मार्ग त्याग दिया ॥१६५॥ मैं द्यूत और शस्त्र-विद्या का अभ्यास करने लगा। सच है, गुरुजनों के शासन से रहित किसकी बाल्यावस्था उच्छृङ्खल नहीं हो जाती ॥१६६॥ क्रमशः बाल्यावस्था बीतने पर युवावस्था में भुजबल के मद से मत्त होकर बाणों को छोड़ने के लिए मैं एकबार जंगल में गया ॥१६७॥ उस समय रथ पर बैठी हुई और बहुत-से बरातियों से घिरी हुई एक नई वधू नगरी से निकली ॥१६८॥ इतने में ही मैंने देखा एकाएक बिगड़ा हुआ एक हाथी साँकल तोड़कर कहीं से आकर उस वधू पर आक्रमण करने लगा। हाथी के डर से उसके सभी पुरुषार्थ-हीन साथी उसके पति के साथ इधर-उधर भाग गये ॥१६९-१७०॥ यह देखकर घबराये हुए मैंने सोचा—'ओह, इन कायरों ने इस वधू को कैसे सर्वथा असहाय और अकेला ही छोड़ दिया' ॥१७१॥ तो मैं अब इस हाथी से इस अनपराधा की रक्षा करता हूँ। विपद्ग्रस्त की रक्षा से हीन प्राणों से या पराक्रम से लाभ ही क्या है ॥१७२॥ ऐसा सोचकर मैंने हाथी को ललकारा। हाथी भी उस स्त्री को छोड़कर मेरी ओर भागता हुआ आया ॥१७३॥ उस डरी हुई वधू से वेग से जाता हुआ और शब्द करता हुआ मैं हाथी को दूर तक दौड़ाता हुआ ले गया ॥१७४॥ इस प्रकार दौड़ते हुए मुझे मार्ग में घने पत्तोंवाली टूटी हुई एक वृक्ष की शाखा मिली। मैंने अपने को उसी में छिपा लिया और धीरे-धीरे छिपकर वृक्षों और पत्तों के झुरमुट में चला गया ॥१७५॥ उस शाखा को तिरछी करके मैंने पेड़ के साथ रख दिया और मैं भाग गया। पीछे से दौड़कर आते हुए हाथी ने उस शाखा को क्रोध में रौंद डाला ॥१७६॥ तब हाथी के चले जाने पर मैं उस स्त्री के पास आया और भयभीत उससे मैंने उसके शरीर का कुशल पूछा ॥१७७॥ वह मुझे देखकर कुण्ठित और हर्षित दोनों भाव प्रकट करती हुई बोली—क्या कुशल पूछते हो? मुझे ऐसे एक कायर मानव को दिया गया जो मुझे ऐसे प्राण-संकट में छोड़कर कहीं भाग गया। कुशल यही है कि तुम्हें मैंने बिना किसी फल (भाव) के पुत्र देखा ॥१७८-१७९॥