भारतकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

पृष्ठ 690, कुल 876 में से

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षष्ठ लम्बक ११५ यह सुनकर वह ऋषि बोला- देवि ऐसा न करो। वह राजा मेरे धर्म में सहायक है विरोधी नहीं ॥३५॥ हे भगवति उसकी कृपा से मुझे क्षमा-धर्म मिला। यदि वह ऐसा न करे, तो किस पर क्षमा की जाय ॥३६॥ मनस्वी जन इस नश्वर शरीर के लिए कोप नहीं करते। मित्र और शत्रु पर समान रूप से क्षमा करना ही ब्राह्मण का धर्म है ॥३७॥ इस प्रकार मुनि से कही गई और उसकी तपस्या से सन्तुष्ट वह देवी यति के अंगों को अक्षत (पूर्ण) करके अन्तर्धान हो गई ॥३८॥ अतः जैसे वह राजा उस ऋषि का उपकारी बना उसी प्रकार आँखें उखाड़ लेने के कारण मेरे तप को बढ़ाकर हे माता तुमने भी उपकार किया है ॥३९॥ ऐसा कहकर वह यती भिक्षु प्रणाम करती हुई उस वैश्य-वधू के मग्न होने पर अपने सुन्दर शरीर का भी ध्यान न देकर सिद्धि के लिए चला गया ॥४०॥ यह कथा सुनकर राजकन्याएं बोलीं—इसलिए चारु और सुन्दर होने पर भी नष्ट होने वाले शरीर पर क्या आग्रह ? इसलिए प्राणिमात्र के प्रति उपकार करना ही एक मात्र बुद्धिमान् के लिए प्रशंसनीय कार्य है ॥४१॥ इसलिए हम सातों कन्याएं स्वाभाविक सुख के घर इस श्मशान में प्राणियों के उपकार के लिए क्षुद्र शरीर को दे रही हैं॥४२॥ अपने परिवारवालों को इस प्रकार कहकर उन सातों राजकुमारियों ने ऐसा ही किया और उससे परमसिद्धि प्राप्त की ॥४३॥ बुद्धिमानों को अपने शरीर पर भी ममता नहीं होती। पुत्र-दारा आदि घास-फूस की तो बात ही क्या ॥४४॥ उस राजा ने विहार में धर्मोपदेशक से यह सब बातें सुनकर दिन व्यतीत किया और सायंकाल अपने भवन में आकर फिर भी कन्या-जन्म के शोक में मग्न हो गया। इतने पर घर के किसी बूढ़े ब्राह्मण ने आकर राजा से कहा—हे राजन् ! कन्यारत्न के जन्म से क्यों इतना सन्तप्त हो रहे हो। कन्याएँ तो पुत्र से भी उत्तम होती हैं और इहलोक तथा परलोक में भी कल्याण देनेवाली होती हैं ॥४५-४७॥ राज्य के लोभी पुत्रों में राजाओं का कैसा प्रेम जो बन्दरों के समान पिता को नोच खाते हैं॥४८॥ कुन्तिभोज आदि राजा कुन्ती आदि कन्याओं के कारण ही दुःसह दुर्वासा आदि के शाप से बच गये ॥४९॥

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