भारतकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

पृष्ठ 694, कुल 876 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 694

षष्ठ स्तबक ६६१ तदनन्तर वह राजा चिरकाल तक इस उद्यान में उस अप्सरा के साथ क्रीड़ा करता रहा। रम्भा भी स्वर्ग को भूल गई। सच है, प्रेम प्यारा होता है, जन्मभूमि नहीं॥१४॥ जैसे आकाश सुभट के स्वर्ण-शृंगों से भर जाता है, उसी प्रकार रम्भा की सखी यक्षिणी ने राजा की वह भूमि मान की वर्षा से भर दी॥१५॥ कुछ समय पश्चात् सुरत के समागम से गर्भवती रम्भा ने असाधारण सुन्दरी कन्या उत्पन्न की॥१६॥ कन्या प्रसव करते ही रम्भा राजा से बोली—'राजन्, मुझे इतने दिनों का शाप प्राप्त था। अब वह क्षीण हो गया। मैं रम्भा नाम की स्वर्गाङ्गना हूँ। तुम्हें देखने पर प्रेम से आकृष्ट हो गई थी। तदुपारन्त गर्भ हो जाने पर इसे यहीं छोड़कर अभी ही जा रही हूँ॥१७-१८॥ हमारी मर्यादा ही ऐसी है। तुम इस कन्या की रक्षा करना। इसके विवाह से स्वर्ग में हम दोनों का पुनः समागम होगा'॥१९॥ ऐसा कहकर वह विवश रम्भा अन्तर्धान हो गई। उसके वियोग-दुःख से राजा प्राण देने के लिए तैयार हो गया॥२०॥ 'इसी प्रकार शकुन्तला को उत्पन्न करके ही स्वर्ग चली गई। मेनका के लिए क्या विश्वा- मित्र ने प्राण दे दिये थे?' मन्त्रियों की इस प्रकार की बातों से धीरज दिलाया गया वह राजा किसी प्रकार धीरे-धीरे धीरज रख सका और उस रम्भा से पुनर्मिलन की आशा के कारण उसने कन्या को ग्रहण किया॥२१-२२॥ उस सर्वाङ्गसुन्दरी कन्या का राजा ने एकाधिपत्य से पालन प्रारम्भ किया और उसके लोचनों के अत्यन्त सुन्दर होने के कारण उसका नाम सुलोचना रखा॥२३॥ समग्र यौवन में आई हुई और उद्यान में विचरण करती हुई उसे अकस्मात् कश्यप ऋषि के पुत्र वत्स्य ने देखा॥२४॥ तपोबलि होने पर भी वत्स्य मुनि उस कन्या को देखकर प्रेमरस (ज्ञाता) रसिक होकर सोचने लगा॥२५॥ 'अहा! इस बालिका का कैसा अद्भुत रूप है! यदि इसे पत्नी के रूप में प्राप्त न कर सके तो मेरे तप का और दूसरा फल ही क्या होगा॥२६॥ इस प्रकार सोचता हुआ उस मुनि वत्स्य को सुलोचना ने जलती हुई ज्वालावाला निर्धूम अग्नि के समान देखा॥२७॥ उस मुनि को देखकर प्रणमयी वह कन्या भी 'स्फटिक-माला और कमण्डलु लिए हुए शान्त और सुन्दर यह युवक कौन है?' इस प्रकार सोचने लगी॥२८॥