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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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प्रथम लम्बक १९

"निन्दा होने की अपेक्षा मर जाना श्रेष्ठ है। इसलिए उपकोशा के माता पिता तुम्हारी सखी के मनोभाव को यदि समझ लें तो कल्याण हो सकता है॥१५॥ इसलिए तुम ऐसा करके अपनी सखी और मुझे दोनों को जिलाओ तुम्हारा कल्याण हो। यह सुनकर वह घर गई और उपकोशा की माता से सारा वृत्तान्त कह सुनाया ॥१६॥ उपकोशा की माता ने यह सब वृत्तान्त अपने पति उपवर्ष से कहा। उपवर्ष ने अपने बड़े भाई वर्ष से कहा और वर्ष ने उसका अनुमोदन किया ॥१७॥ इस प्रकार विवाह का निश्चय हो जाने पर आचार्य वर्ष की आज्ञा से व्याडि कौशाम्बी से मेरी माता को लिवा लाया॥१८॥ तदनन्तर उसके पिता उपवर्ष ने विवाह तिथि पर विधिपूर्वक उपकोशा मुझे प्रदान कर दी और मैं भी माता तथा पत्नी के साथ पाटलिपुत्र में सुखपूर्वक रहने लगा ॥१९॥ पाणिनि की कथा¹

कुछ समय के अनन्तर उपाध्याय वर्ष के शिष्यों की संख्या बढ़ी। उसमें पाणिनि नाम का एक शिष्य अत्यन्त जड़बुद्धि था॥२० ॥ उस गुरु-गृह में सेवा करते हुए अत्यन्त क्लेश-युक्त और खिन्न देखकर गुरु-पत्नी ने विद्या-प्राप्ति की कामना से तपस्या करने के लिए हिमालय जाने को कहा और वह चला गया ॥२१॥ तब वहाँ उसने अपनी कठोर तपस्या से प्रसन्न हुए शिवजी से सब विद्याओं के मूलस्वरूप नवीन व्याकरण को प्राप्त किया ॥२२॥ हिमालय से लौटने पर पाणिनि ने मुझे शास्त्र-विचार के लिए ललकारा। फलतः हम लोगों का शास्त्रार्थ प्रारम्भ हुआ और सात दिन व्यतीत हो गये ॥२३॥ आठवें दिन मेरे द्वारा शास्त्रार्थ में पाणिनि को जीत लेने पर आकाश में शिवजी ने भयंकर हुंकार किया ॥२४॥ उस हुंकार से हमारा पढ़ा हुआ ऐन्द्र व्याकरण पृथ्वी से नष्ट हो गया। तब पाणिनि ने हम लोगों को जीत लिया और हम सब फिर मूर्ख हो गये ॥२५॥ उस शास्त्र-विचार में पाणिनि से पराजित होने के कारण मुझे अत्यन्त वैराग्य उत्पन्न हुआ और घर का सर्वस्व वररुचि के पिता तुल्य मित्र व्याडि को देकर और यह बात उपकोशा को बता- कर तपस्या से शंकरजी को प्रसन्न करने के लिए मैं निराहार होकर हिमालय को चला गया॥२६-२७॥

१ इसमें वर्णित पाणिनि की कथा ऐतिहासिक अनुप और प्रमाणिक नहीं मानी जा सकती। पाणिनि और वररुचि के समय में पर्याप्त अन्तर है। परिशिष्ट-प्रकरण में 'पाणिनि' देखिए।